अफ़ग़ानिस्तान में अस्थिरता की कहानी (भाग-१)

८ नवंबर १९३३। काबुल के राजमहल में एक समारोह आयोजित था। इस समारोह में अफ़ग़ानिस्तान के राजा मोहम्मद नादिर शाह के हाथों नेजात हाईस्कूल के छात्रों को खेलों में अच्छे प्रदर्शन के लिए मेडल दिए जाने वाले थे। १७ साल का अब्दुल खालिक हज़ारा भी उनमें से एक था।

तय समय पर शाह का आगमन हुआ। लोगों का अभिवादन करके उन्होंने टेबल पर सजे मेडलों को देखा और फिर छात्रों की ओर बढ़े।

तभी अचानक अब्दुल खालिक ने अपनी जेब से पिस्तौल निकालकर दनादन तीन गोलियां दाग दीं। पहली गोली शाह के मुँह में लगी, दूसरी सीने पर लगी और तीसरी गोली ने फेफड़े को छलनी कर दिया। शाह की वहीं मौत हो गई।

नादिर शाह की हत्या के बाद उनके बेटे ज़हीर खान को नया ‘शाह’ (राजा) घोषित किया गया। उस समय ज़हीर शाह की उम्र केवल १९ वर्ष की थी। इसलिए सत्ता पर वास्तविक नियंत्रण उनके चाचा सरदार मोहम्मद हाशिम खान का ही बना रहा। हाशिम खान को १९२९ में नादिर शाह ने प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। १९४६ में प्रधानमंत्री पद पर हाशिम खान के छोटे भाई सरदार शाह महमूद खान की नियुक्ति हुई। वह १९५३ तक इस पद पर रहे।

उसी दौरान १९४७ में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान नाम से एक नया देश बना। इस नए देश में एक बड़ा इलाका पश्तून (पठान) कबीलों का था। अफ़ग़ानिस्तान में लगभग आधी जनसंख्या पश्तून है, इसलिए अफ़ग़ानिस्तान की सरकार ने पाकिस्तान के पश्तून इलाके पर भी दावा कर दिया। महमूद खान ने मांग की कि पाकिस्तानी पश्तूनों को यह तय करने का अधिकार दिया जाए कि वे पाकिस्तान में शामिल होना चाहते हैं या अफ़ग़ानिस्तान में।

यह मांग तो अंग्रेज़ों ने नहीं मानी, लेकिन इसके कारण शुरू से पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के संबंधों में दरार पड़ गई। उसी समय अफ़ग़ानिस्तान में आर्थिक संकट भी चल रहा था। पश्चिमी अफ़ग़ानिस्तान में एक बड़ी सिंचाई परियोजना का काम भी विफल हो गया। इन सब विफलताओं के कारण अंततः १९५३ में महमूद खान को पद छोड़ना पड़ा और ज़हीर शाह ने अपने सौतेले भाई मोहम्मद दाऊद खान को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया।

अति-महत्वाकांक्षी दाऊद खान की कार्यशैली तानाशाहों जैसी थी। सबसे पहले दाऊद खान ने ड्यूरेंड लाइन को अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा मानने से इनकार कर दिया और यह मांग दोहराई कि पाकिस्तान के पश्तून इलाके वास्तव में अफ़ग़ानिस्तान का हिस्सा हैं। १९६० में और फिर एक बार १९६१ में दाऊद खान ने पाकिस्तान पर हमला करने के लिए सेना भी भेजी। लेकिन दोनों बार अफ़ग़ानिस्तान की बुरी हार हुई। इसके बाद पाकिस्तान ने अपनी अफ़ग़ानिस्तान सीमा बन्द कर दी।

अब दाऊद खान ने सोवियत संघ से मदद मांगी। सोवियत संघ ने बहुत कम कीमत पर अफ़ग़ानिस्तान को लड़ाकू विमान, टैंक और बड़ी मात्रा में अन्य हथियारों की आपूर्ति की, लेकिन इसके कारण धीरे-धीरे अफ़ग़ानिस्तान लगभग पूरी तरह सोवियत संघ पर निर्भर हो गया।

उधर पाकिस्तान ने व्यापारिक प्रतिबंध भी लगा दिए थे जिसके कारण अफ़ग़ानिस्तान आर्थिक संकट में भी घिर गया था। इन सब बातों से नाराज़ राजा ज़हीर खान ने प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगा। लेकिन दाऊद खान ने पड़ छोड़ने के बजाय राजा से ही यह मांग कर डाली कि संविधान में संशोधन करके लोकतंत्र समाप्त कर दिया जाए और एकदलीय प्रणाली लागू की जाए, जिसमें दाऊद खान को ही प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाएगा।

ज़हीर शाह को दाऊद की कार्यशैली बिल्कुल नापसंद थी। १९३३ में जब ज़हीर शाह राजा बने, तब तो उनकी उम्र बहुत कम थी और अनुभव भी शून्य था, लेकिन १९६३ तक आते-आते उन्होंने सत्ता पर पूरा नियंत्रण बना लिया था।

इसलिए अब उन्होंने दाऊद की मांग पूरी तरह ठुकरा दी और उसे इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। इतना ही नहीं, १९६४ में उन्होंने देश में नया संविधान लागू करके प्रधानमंत्री पद पर राज-परिवार के लोगों की नियुक्ति भी प्रतिबंधित कर दी। इससे यह तय हो गया कि दाऊद खान को फिर से प्रधानमंत्री बनने का अवसर नहीं मिलेगा।

ज़हीर शाह के शासन-काल में दुनिया के कई महत्वपूर्ण देशों के साथ अफ़ग़ानिस्तान के अच्छे संबंध रहे। १९३४ में अफ़ग़ानिस्तान ‘लीग ऑफ़ नेशन्स’ का सदस्य बना और उसी वर्ष अमरीका ने भी इसे एक देश के रूप में मान्यता दी। जर्मनी, जापान और इटली के साथ भी अफ़ग़ानिस्तान के व्यापारिक समझौते हुए। इसके बावजूद द्वितीय विश्व-युद्ध में ज़हीर शाह ने अफ़ग़ानिस्तान को दोनों पक्षों से अलग रखने में भी सफलता पाई। आगे शीत-युद्ध के दौर में भी उन्होंने अमरीका और सोवियत रूस से समान दूरी बनाए रखी। ज़हीर शाह ने कहा था कि वे न तो पूँजीवादी हैं और न समाजवाद चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि ‘मैं अफ़ग़ानिस्तान को रूस, चीन या किसी भी अन्य देश का नौकर नहीं बनाना चाहता।’ इसलिए उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान को दोनों पक्षों से स्वतंत्र रखा।

ज़हीर शाह आधुनिक विचारों वाले व्यक्ति थे। उनके शासन काल में अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता आई, महिलाओं को कई अधिकार मिले, लोकतंत्र मज़बूत हुआ, स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित हुए, और अन्य देशों के साथ अफ़ग़ानिस्तान के आर्थिक और व्यापारिक संबंध भी विकसित हुए। दाऊद खान को हटाए जाने के बाद पाकिस्तान ने भी आर्थिक प्रतिबंध हटा लिए और व्यापार फिर से शुरू हो गया।

लेकिन दाऊद खान भी चुपचाप नहीं बैठे थे। उनकी राय थी कि ज़हीर शाह में नेतृत्व क्षमता का अभाव है और संसदीय प्रणाली अफ़ग़ानिस्तान की प्रगति में एक बड़ी बाधा है, इसलिए इसे समाप्त कर देना चाहिए। अफगान सेना और नौकरशाही के कुछ वामपंथी अफ़सरों, अफ़ग़ानिस्तान की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के एक गुट और सोवियत संघ की मदद से दाऊद खान ने तख्तापलट की योजना बनाई।

२५ जून १९७३ को ज़हीर शाह अपनी आँखों की सर्जरी के लिए लंदन गए। उनके कई विश्वसनीय साथी भी उनके साथ थे। सफल उपचार के बाद वे लोग कुछ दिन छुट्टियां बिताने के लिए इटली चले गए। इसी दौरान १७ जुलाई की सुबह अचानक अफगान सेना ने राजमहल को अपने नियंत्रण में ले लिया। किसी ने भी उनका विरोध नहीं किया और केवल कुछ ही घंटों में अफ़ग़ानिस्तान की दो सौ वर्ष पुरानी इस राजशाही का अंत हो गया! अफगान रेडियो पर घोषणा कर दी गई कि ज़हीर शाह को पद से हटा दिया गया है और अफ़ग़ानिस्तान अब एक गणतंत्र बन गया है।

दाऊद खान ने स्वयं को अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रपति और सैन्य-प्रमुख घोषित कर दिया। पुराना राजमहल अब नया राष्ट्रपति निवास बन गया। नए संविधान में लोकतांत्रिक चुनाव वाली ज़हीर शाह की प्रणाली को बदलकर वामपंथी मॉडल वाली नई प्रणाली लागू कर दी गई, जिसमें लोया जिरगा (संसद) के अधिकाँश सदस्य लोगों द्वारा चुने जाने के बजाय शासकों द्वारा मनोनीत किए जाने थे। दो दिन बाद ही १९ जुलाई को सोवियत संघ और भारत ने इस नई वामपंथी सरकार को मान्यता दे दी।

इस नई सरकार के प्रति लोगों के समर्थन को देखते हुए ज़हीर शाह ने अपनी हार स्वीकार कर ली और विरोध न करने का निर्णय लिया। इसके बाद अगले २९ वर्षों तक ज़हीर शाह को इटली में ही निर्वासन में रहना पड़ा। इस दौरान कई बार कई देशों ने उनकी वापसी के प्रयास किए, लेकिन अंततः तालिबान शासन की समाप्ति के बाद अप्रैल २००२ में ही ज़हीर शाह अफ़ग़ानिस्तान वापस लौट पाए। उस समय उनकी आयु ८७ वर्ष की थी। लंबी बीमारी के बाद २३ जुलाई २००७ को काबुल में ही अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपिता ज़हीर शाह का निधन हो गया।

सन १९७३ में दाऊद खान तो ज़हीर शाह को पद से हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले तो ली, लेकिन वे ज़्यादा समय  तक शासन कर नहीं पाए। केवल पाँच वर्षों बाद ही अप्रैल १९७८ में अफ़ग़ानिस्तान के वामपंथियों ने सोवियत रूस की मदद से सत्ता पर कब्जा कर लिया। दाऊद खान और उनके पूरे परिवार को मौत के घाट उतार दिया गया। इसके कुछ ही महीनों बाद अफ़ग़ानिस्तान में रूसी सेना घुस गई और उसी समय से अफ़ग़ानिस्तान में एक लंबे युद्ध की शुरुआत हुई, जो आज तक चल रहा है। इसके बारे में मैं अगली बार बात करूँगा।

(सभी चित्र विकिपीडिया से)

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