अफ़ग़ानिस्तान में अस्थिरता की कहानी (भाग-२)

लेख के पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि सन 1973 में दाऊद खान ने अफगानिस्तान के राजा ज़हीर शाह के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया और अफगानिस्तान में राजशाही समाप्त हो गई। ज़हीर शाह उस समय इटली में थे और इस विद्रोह के कारण 2002 तक वे वहीं निर्वासन में रहे। उसी समय से अफगानिस्तान में हिंसा, अस्थिरता और गृह-युद्ध का एक दुःखद अध्याय शुरू हुआ, जो आज तक चल रहा है।

दाऊद खान ने ज़हीर शाह के खिलाफ विद्रोह क्यों किया, इसके कई कारण हैं। लेकिन शीत-युद्ध उसका एक बड़ा कारण है। सन 1947 से 1991 तक अमरीका और सोवियत संघ के बीच लगभग 45 वर्षों तक शीत-युद्ध चल रहा था। वास्तव में यह पूँजीवाद और साम्यवाद की लड़ाई थी और लगभग पूरी दुनिया इसकी चपेट में थी। वामपंथी पूरी दुनिया से लोकतंत्र और राजतंत्र को मिटाकर हर जगह साम्यवादी तानाशाही चाहते थे। अफगानिस्तान उस समय के सोवियत रूस का एक पड़ोसी देश था। आज अफगानिस्तान के उत्तर में जो तुर्कमेनिस्तान, ताजीकिस्तान और उज्बेकिस्तान देश हैं, वे उस समय सोवियत रूस का हिस्सा थे। स्वाभाविक था कि विस्तारवादी वामपंथियों का अगला निशाना अफगानिस्तान था।

लेकिन इसके अलावा एक कारण और भी था। रूस हिन्द महासागर तक पहुँचने का रास्ता चाहता था। उसके लिए दो आवश्यक चरण थे: पहले अफगानिस्तान पर कब्जा और फिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान पर कब्जा। इससे पहले भी जब भारत में अंग्रेज़ों का राज था, तब रूस भी साम्राज्य विस्तार में लगा हुआ था और तब भी उसने अफगानिस्तान में घुसने की कोशिश की थी। उस समय पाकिस्तान नहीं बना था और ब्रिटिश भारत की सीमाएँ अफगानिस्तान से लगती थी। अंग्रेज़ों को डर था कि रूस अफगानिस्तान के रास्ते भारत पर भी कब्जा करना चाहता है। इसलिए ब्रिटिश शासन की रक्षा के लिए 1830 से 1895 तक रूस और ब्रिटेन के बीच अफगानिस्तान में संघर्ष चलता रहा, जो कि इतिहास में ‘द ग्रेट गेम’ के नाम से जाना जाता है।

अंग्रेज़ों और अफगानों के बीच तीन बड़े युद्ध हुए, जो आंग्ल-अफ़गान युद्धों के नाम से जाने जाते हैं। इन युद्धों के कारण अफगानिस्तान को अपनी पूर्वी सीमा का बहुत-सा हिस्सा गंवाना पड़ा था, जो कि अंग्रेज़ों के कब्जे में आ गया। यह आज के पाकिस्तान में बलूचिस्तान का हिस्सा है। 1893 में अंग्रेज़ों ने ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच सीमा का निर्धारण कर दिया, जो कि डूरंड लाइन कहलाती है। उसके अनुसार अफगानिस्तान का एक बड़ा पश्तून इलाका ब्रिटिश शासन में आ गया, और 1947 में पाकिस्तान बनने पर वह पाकिस्तान के बलूचिस्तान का हिस्सा बना। अफगानिस्तान और बलूचिस्तान दोनों ही इलाकों में सबसे बड़ी संख्या पठानों की है। इसलिए अफगानिस्तान का हमेशा से यही दावा रहा है कि बलूचिस्तान अफगानिस्तान का हिस्सा है, पाकिस्तान का नहीं। अफगानिस्तान और बलूचिस्तान दोनों ही तरफ ऐसे गुट थे, जो बलूचिस्तान को पाकिस्तान से अलग करके अफगानिस्तान में मिलाना चाहते थे।

सोवियत रूस की योजना पहले अफगानिस्तान पर कब्जा करने और फिर ऐसे गुटों को पाकिस्तान के खिलाफ उकसाने की थी, ताकि बलूचिस्तान पर भी कब्जा हो सके और हिन्द महासागर तक का रास्ता रूस के लिए खुल जाए। हालांकि ऐसा हो नहीं सका क्योंकि उधर चीन की नज़र भी बलूचिस्तान पर थी। उसे भी ईरान और मध्य-पूर्व से तेल की आपूर्ति पाने के लिए फ़ारस की खाड़ी तक पहुँचने का रास्ता चाहिए था। अंततः बलूचिस्तान पर कब्जे के लिए चीन और रूस की इस लड़ाई में चीन की जीत हुई और आज ग्वादर के बंदरगाह पर और लगभग पूरे पाकिस्तान पर चीन का नियंत्रण है। जिस तरह आज पाकिस्तान चीन के कब्जे में है, उसी तरह उस समय सोवियत रूस अफगानिस्तान पर कब्जा चाहता था।

लेकिन ज़हीर शाह के शासन-काल में अफगानिस्तान बहुत तेज़ी से अमरीका और यूरोप के पाले में जा रहा था। ज़हीर शाह ने कई यूरोपीय देशों से व्यापारिक समझौते किए, उनसे नई तकनीक और ज्ञान-विज्ञान की जानकारी अफगानिस्तान पहुँचने लगी। देश का विकास हो रहा था। हर तरफ शान्ति का माहौल था। ज़हीर शाह ने अफगानिस्तान में लोकतंत्र की भी नींव रख दी थी। इन सब बातों से रूस को चिंता हो रही थी कि अफगानिस्तान विरोधी खेमे में चला जाएगा।

पिछले भाग में मैंने यह भी बताया था कि 1953 से 1963 तक जब दाऊद खान अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री थे, तब पाकिस्तान के पश्तून इलाकों (बलूचिस्तान) को छीनने के लिए उन्होंने आक्रामक अभियान चलाया था और पाकिस्तान से युद्ध भी किए थे, जिनमें हर बार अफगानिस्तान की हार हुई। अफगान सेना को मजबूत करने के लिए दाऊद खान ने सोवियत रूस से मदद मांगी और अपने हित साधने के लिए रूस ने भी मदद की। रूस से बहुत कम कीमत पर अफगानिस्तान को हथियार, टैंक और अन्य सैन्य-सामग्री उपलब्ध करवाई। उसी के साथ-साथ इनका प्रशिक्षण देने और अफगान सरकार को परामर्श देने के लिए सैकड़ों रूसी ‘विशेषज्ञ’ भी अफगानिस्तान में घुस गए। इस तरह रूस की ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी ने अफगानिस्तान में घुसपैठ कर ली।

दाऊद खान की हरकतों से परेशान होकर ज़हीर शाह 1963 में उन्हें पद से हटा दिया और अगले ही वर्ष 1964 में ज़हीर शाह ने अफगानिस्तान में नया संविधान भी लागू कर दिया, जिसके अनुसार राजपरिवार का कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बन सकता था। इस तरह दाऊद खान के लिए फिर से प्रधानमंत्री बनने का रास्ता भी बंद कर दिया गया।

इसके कुछ ही समय बाद 1965 में अफगानिस्तान में एक नई राजनैतिक पार्टी का गठन हुआ। इसका नाम था- पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ अफगानिस्तान (पीडीपीए)। यह एक वामपंथी दल था। बाबराक करमल और नूर मोहम्मद तराकी नाम के दो नेता इसके संस्थापक थे। कृपया इन दोनों नेताओं का और इस पार्टी का नाम याद रखियेगा क्योंकि अफगानिस्तान में आगे जो उथल-पुथल हुई, उसमें इनकी बड़ी भूमिका थी।

पीडीपीए 1965 से 1992 तक अस्तित्व में रही और लगभग पूरे समय यह दो मुख्य गुटों में बंटी रही। इनमें से एक था ‘खल्क’ (इसका अर्थ है “जनता/लोग/अवाम”) और दूसरा गुट था ‘परचम’ (इसका अर्थ है “बैनर/झंडा”)। खल्क एक उग्रवादी और कट्टरपंथी समूह था, जिसमें अधिकांशतः कबीलाई और ग्रामीण इलाकों के लोग थे, जबकि परचम थोड़ा उदारवादी समूह था, जिसमें अधिकतर शहरी मध्यमवर्गीय और उच्च-मध्यमवर्गीय लोग थे। इन दोनों गुटों के बारे में आपको याद रखना चाहिए क्योंकि आगे के वर्षों में इनकी भी बड़ी भूमिका रही।

1963 में दाऊद खान के हटने के बाद अगले दस वर्षों के दौरान अफगानिस्तान में 6 प्रधानमंत्री हुए। इनमें से आखिरी थे मोहम्मद मूसा शफीक, जो नवंबर 1972 से जुलाई 1973 तक प्रधानमंत्री रहे। मूसा उदारवादी व्यक्ति थे। उन्होंने अफगानिस्तान के आधुनिकीकरण के लिए अमरीका से अच्छे संबंध बनाने पर ज़ोर दिया। इसके अलावा पानी के बंटवारे को लेकर ईरान के साथ अफगानिस्तान का एक विवाद चल रहा था, उसे भी उन्होंने बातचीत से हल कर लिया। उस समय ईरान के राजा मोहम्मद रज़ा पहलवी थे, जो कि ज़हीर शाह के समान ही आधुनिक विचारों वाले थे और पश्चिम के साथ अच्छे संबंध बनाकर ईरान का आधुनिकीकरण करना चाहते थे। इस कारण भी सोवियत रूस को चिंता हुई कि अफगानिस्तान भी कहीं पश्चिमी और अमरीकी खेमे में न चला जाए।

दाऊद खान तो वैसे भी ज़हीर शाह से नाराज़ ही थे। उन्हें यह भी लगता था कि ज़हीर शाह ने अफगानिस्तान में जो संवैधानिक संसदीय प्रणाली लागू की थी, उसके कारण देश की प्रगति बहुत सुस्त हो गई थी। दाऊद खान सत्ता पर कब्जा करने का मौका ढूंढ रहे थे। उधर रूसी भी अफगानिस्तान को अमरीकी खेमे में जाने से रोकने के लिए सत्ता में अपना मोहरा बिठाना चाहते थे। दाऊद खान की रूसियों से पुरानी दोस्ती भी थी, इसलिए दोनों ही इस तख्तापलट के लिए एक-दूसरे के साथ हो गए। इसमें पीडीपीए के परचमी गुट ने भी मुख्य भूमिका निभाई।

दाऊद खान को 1963 में भले ही प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा था, लेकिन सैन्य-पद से नहीं। 1973 में वे अफगानिस्तान के सैन्य-प्रमुख थे। इसलिए सेना पर उनका ही नियंत्रण था। पीडीपीए और अफगान सेना दोनों में ही परचमी गुट के लोग मौजूद थे। उनके साथ मिलकर दाऊद खान ने ज़हीर शाह को हटा दिया और खुद को राष्ट्रपति घोषित करके अफगानिस्तान से राजशाही समाप्त कर दी। लेकिन उन्होंने ऐसी कई गलतियां भी कर दी थीं, जो बहुत भारी पड़ीं। इस कारण केवल पाँच वर्षों में ही उन्हें अपनी सत्ता भी गंवानी पड़ी और अपनी जान भी।

राजतंत्र को समाप्त करना सबसे पहली गलती थी। अफगानिस्तान में यह राजवंश सन 1747 से राज कर रहा था और अफगान लोग राजा के पद को।बहुत पवित्र समझकर उसका बहुत आदर करते थे। गणतंत्र उनके लिए बिल्कुल अनजान प्रणाली थी, इसलिए राष्ट्रपति के पद को लोगों ने वैसा आदर नहीं मिला। इसी कारण पाँच वर्षों बाद ही दाऊद खान का तख्ता पलटने वालों को इसमें कोई झिझक नहीं हुई, जबकि शायद किसी राजा के साथ उन्होंने वैसा न किया होता। दाऊद खान स्वयं भी राजवंश के सदस्य थे, इसलिए उन्होंने स्वयं को नया राजा घोषित किया होता, तो शायद सत्ता पर उनका अधिकार लंबे समय तक रह पाता। वैसे शायद यह भी हो सकता है कि वामपंथियों के दबाव में ही उन्हें राजशाही समाप्त करनी पड़ी हो। कुछ वर्षों बाद वामपंथियों ने नेपाल में भी तो यही किया था!

ज़हीर शाह और उनके वफादार लोगों को हटाने के लिए दाऊद खान ने पीडीपीए और अफगान सेना के जूनियर नेताओं और सैन्य-अधिकारियों की मदद ली थी। इस मदद के बदले राष्ट्रपति बनने के बाद उनहें डबल-प्रमोशन देकर आगे बढ़ाया गया। इसके कारण भी अन्य लोगों को भविष्य में दाऊद खान के खिलाफ हुए विद्रोह में उनके विरोधियों की मदद करने का प्रोत्साहन मिला।

चूंकि दाऊद खान ने वामपंथियों की मदद से सत्ता हथियाई थी, इसलिए उन्हें वामपंथियों को सरकार में बड़े पदों पर शामिल करना पड़ा। ये लोग साम्यवाद के नाम पर अफगानिस्तान की पारंपरिक व्यवस्थाओं को हटाकर वामपंथी मॉडल लागू करना चाहते थे। इसके कारण कट्टरपंथी इस्लामी गुटों में नाराज़गी की शुरुआत हुई। मौलवियों और कबीलों के पारंपरिक मुखियाओं को आशंका हुई कि उनके अधिकारों और शक्तियों को वामपंथी लोग चुनौती दे रहे हैं, तो उन्होंने इसे इस्लाम के खिलाफ युद्ध माना। इसके कारण छोटे-छोटे कट्टरपंथी उग्रवादी गुटों की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर मुजाहिदीन और तालिबान जैसे बड़े और शक्तिशाली संगठन बन गए। 

उन दिनों बुरहानुद्दीन रब्बानी और गुलबुद्दीन हिकमतयार दो बड़े मुजाहिदीन नेता थे। सरकार-विरोधी गतिविधियों के कारण जब दाऊद खान की सरकार ने जब इनकी गिरफ्तारी के प्रयास शुरू किए, तो दोनों अपनी जान बचाने के लिए पाकिस्तान भाग गए। वहाँ जुल्फिकार अली भुट्टो ने ख़ुशी-ख़ुशी उनका स्वागत किया।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के खिलाफ हमेशा से ही सीमा-विवाद चल रहा था। 1973 में राष्ट्रपति बनने के बाद दाऊद खान ने फिर एक बार यही मुद्दा उठाया। उधर पाकिस्तान में भी उसी वर्ष बलूचों ने पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया और पाकिस्तानी सेना से लड़ने वाले नए उग्रवादी संगठनों की स्थापना हुई। उनके लोगों को दाऊद खान की सरकार ने अफगानिस्तान में शरण दी और उन्हें प्रशिक्षण और हथियार भी दिए।

इसके जवाब में पाकिस्तान की भुट्टो सरकार ने भी 1975 में आईएसआई के माध्यम से अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकी अभियानों की शुरुआत कर दी। इसलिए जब अफगानिस्तान के मुजाहिदीन आतंकी अफगान सरकार से जान बचाने के लिए पाकिस्तान में घुसे, तो पाकिस्तानी सरकार ने न केवल उन्हें पनाह दी, बल्कि उन्हें अफगानिस्तान के खिलाफ लड़ने के लिए प्रशिक्षण और अमरीकी मदद से हथियार भी दिए। कुछ वर्षों बाद पाकिस्तान ने कश्मीर मामले में भी भारत के खिलाफ यही नीति अपनाई।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरूजी ने भले ही गुट-निरपेक्षता का नारा लगाया और शीत-युद्ध में भारत को अमरीका और सोवियत रूस दोनों पक्षों से अलग रखने के दावे किए, लेकिन वास्तव में वे पक्के वामपंथी थे और उनकी सरकार की सभी नीतियाँ पूरी तरह सोवियत मॉडल पर आधारित थीं। उनके बाद इंदिरा गांधी ने भी यही नीति जारी रखी। चूंकि भारत पूरी तरह सोवियत रूस के कब्जे में था, इसलिए भारत को अपना दुश्मन समझने वाला पाकिस्तान स्वाभाविक रूप से अमरीकी खेमे में था।

दाऊद खान ने इस बात की बहुत कोशिश की कि पाकिस्तान के पश्तून इलाकों पर अफगान सरकार के दावे को अमरीका मान ले। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। ईरान और सऊदी अरब भी पाकिस्तान के पक्ष में थे। इसलिए दाऊद खान के पास सोवियत रूस से मदद लेते रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। लेकिन इसके कारण धीरे-धीरे वे पूरी तरह रूस के चंगुल में फंसते चले गए।

बहुत समय के बाद दाऊद खान को यह अहसास हुआ कि पश्तूनिस्तान का मुद्दा अब बेकार है। लेकिन तब तक वे पूरी तरह सोवियत रूस के चंगुल में फंस चुके थे। अब इससे बाहर निकलने के लिए उन्होंने पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की कोशिशें की और अमरीका को खुश करने के लिए रूसियों से दूरी बढ़ाने के प्रयास भी शुरू किए। उन्होंने अपनी सरकार से पीडीपीए के लोगों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया। 1977 में उन्होंने नेशनल रिवॉल्यूशनरी पार्टी नाम से अपनी ही एक राजनैतिक पार्टी बना ली और देश में नया संविधान भी लागू किया। इस संविधान के अनुसार देश में अब केवल वही एक पार्टी हो सकती थी और सभी सरकारी पदों पर केवल उसी पार्टी के सदस्यों की नियुक्ति हो सकती थी। इससे पीडीपीए का अस्तित्व ही दांव पर लग गया था, इसलिए वे लोग खुलकर दाऊद खान के खिलाफ खड़े हो गए।

इन सब बातों के कारण सोवियत रूस की सरकार से अफगानिस्तान के संबंध बहुत बिगड़ चुके थे। रूस को अब भरोसा हो गया था कि अगर उसने जल्दी ही इसका हल न ढूँढा, तो अफगानिस्तान हाथ से निकल जाएगा। इसलिए रूसियों ने अफगानिस्तान में सरकार विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। अप्रैल 1977 में दाऊद खान रूस के दौरे पर गए। तब उन्होंने रूस के सर्वोच्च नेता ब्रेज़नेव के साथ बैठक में ये मुद्दे उठाए। उन्होंने इस बात पर भी नाराज़गी जताई कि रूस पीडीपीए को मजबूत करने और इसके खल्क और परचम गुटों के विवादों को निपटाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा था। बदले में रूस ने दाऊद खान को धमकाने की कोशिश की कि उनकी सरकार अमरीका से दोस्ती बढ़ाने की कोशिशें बंद करे और उत्तरी अफगानिस्तान से नाटो के लोगों को बाहर करे। दाऊद खान ने जवाब में कह दिया कि अफगानिस्तान रूस का गुलाम नहीं है और उसकी नीति रूस तय नहीं कर सकता।

अफगानिस्तान वापस लौटते ही दाऊद खान ने रूस के साथ संबंध पूरी तरह समाप्त करने की योजना पर काम शुरू कर दिया। उन्होंने पश्चिमी देशों और सऊदी अरब व ईरान के साथ व्यापारिक समझौते किए। ये सभी देश अमरीका के साथी थे और रूस के खिलाफ़ थे। अफगान सरकार ने मिस्र के साथ सैन्य समझौता भी किया, जिसके अंतर्गत मिस्र की सेना ने अफगान सेना और पुलिस बल को प्रशिक्षण देना शुरू किया। कुछ ही वर्षों पूर्व 1974 में खुद मिस्र ने भी इसी तरह के कदम उठाए थे और फिर खुद को सोवियत प्रभाव से पूरी तरह अलग कर लिया था। इसलिए अब अफगानिस्तान को उसी राह पर जाता देख रूस आगबबूला हो उठा।

अब मास्को के आदेश पर अफगान पीडीपीए के नेताओं ने खुलेआम दाऊद सरकार का विरोध शुरू कर दिया। बदले में दाऊद खान ने भी पीडीपीए नेताओं की गिरफ़्तारी शुरु कर दी और हर तरह से इस आन्दोलन को कुचलने के प्रयास किए।

17 अप्रैल 1978 को पीडीपीए के परचमी गुट के एक बड़े नेता मीर अकबर खैबर की काबुल में हत्या हो गई। दाऊद सरकार ने इस हत्या के लिए गुलबुद्दीन हिकमतयार के संगठन हज़्ब-ए-इस्लामी को दोषी ठहराया, लेकिन पीडीपीए नेता नूर मोहम्मद तराकी ने आरोप लगाया कि खुद दाऊद खान और उनकी सरकार ने ही यह हत्या करवाई है। काबुल के अधिकांश लोगों की भी यही राय थी। इसके दो दिन बाद 19 अप्रैल 1978 को अकबर को दफनाया गया और काबुल में एक बड़ी सभा हुई, जिसमें पीडीपीए के नेताओं को सुनने के लिए हजारों लोग इकट्ठा हो गए। दाऊद खान को अब तख्ता पलट की आशंका हुई। इसलिए घबराकर उन्होंने पीडीपीए नेताओं की गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। लेकिन सरकार ने इसमें एक हफ्ता लगा दिया। केवल तराकी को गिरफ्तार किया जा सका, जबकि करमल अफगानिस्तान से भागकर रूस चले गए।

27 अप्रैल की सुबह अचानक काबुल की सड़कों पर सेना के टैंक और आसमान में सुखोई विमान दिखाई देने लगे। इन टैंकों ने कुछ ही समय में राष्ट्रपति भवन को घेर लिया। उन्होंने गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की इमारतें भी उड़ा दीं और काबुल के हवाई अड्डे को भी अपने अधिकार में ले लिया। अगले दिन 28 अप्रैल को रेडियो अफगानिस्तान के माध्यम से यह घोषणा कर दी गई कि खल्क (जनता) ने दाऊद सरकार का तख्त पलट दिया है और अपना राज कायम कर लिया है। खल्क शब्द को सुनते ही लोग समझ गए कि वास्तव में जनता के नाम पर पीडीपीए के खल्क गुट के वामपंथियों ने रूस की मदद से सत्ता पर कब्जा कर लिया है।

इस घटना में दाऊद खान और उनके पूरे परिवार को मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन यह पता नहीं चला कि उन्हें कहाँ दफनाया गया था। तीस वर्षों बाद सन 2008 में काबुल की जेल के बाहर दो सामूहिक कब्रों का पता चला। उनमें कुल 28 मृतकों के कंकाल बरामद हुए। उनमें से एक कंकाल के दाँतों के परीक्षण से और  उसके पास मिली एक सुनहरी जिल्द वाली कुरआन से यह पुष्टि हुई कि वही दाऊद खान का कंकाल था। वह कुरआन दाऊद को सऊदी राजा की ओर से उपहार में मिली थी। मार्च 2009 में राजकीय सम्मान के साथ पुनः एक बार दाऊद खान को दफनाया गया।

1978 की दाऊद खान के तख्तापलट की घटना सॉर क्रांति कहलाती है। इसके घटना के बाद अफगानिस्तान में क्या हुआ इस बारे में मैं अगले भागों में लिखूँगा।

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