अफ़ग़ानिस्तान में अस्थिरता की कहानी (भाग-४ )

सोवियत संघर्ष (1979-1989)

पिछले भाग में मैंने बताया था कि दिसंबर 1979 में बड़ी संख्या में रूसी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में घुस गए और 27 दिसंबर को प्रधानमंत्री हाफ़िजुल्ला अमीन की हत्या कर दी गई। इस प्रकार अफ़ग़ानिस्तान सोवियत रूस के सीधे नियंत्रण में आ गया। उसी दिन पीडीपीए के नेता बाबराक कारमल ने रेडियो काबुल से यह घोषणा की कि ‘हाफ़िजुल्ला अमीन के क्रूर और हिंसक शासन का अंत हो गया है। उसने यह भी घोषणा की कि अब अफ़ग़ानिस्तान में एक “राष्ट्रीय लोकतांत्रिक सरकार” का गठन होगा, जो समाजवाद के मार्ग पर चलेगी। 

जो लोग पिछली वामपंथी सरकार के अत्याचारों से घबराकर सीमापार भाग गए थे, उनसे वापस अफ़ग़ानिस्तान लौट आने की अपील की गई और पुरानी सरकार ने जिन विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया था, उन सबको आम माफ़ी देने की भी घोषणा हुई।

[बाबराक कारमल]

कारमल ने यह भी बताया कि देश का एक नया संविधान भी तैयार किया जा चुका है, और सरकार इस्लाम को सर्वोपरि मानकर शासन करेगी। इसका पालन सुनिश्चित करने के लिए एक इस्लामिक विभाग भी बनाया गया, लेकिन वास्तव में कारमल ने इसका उपयोग धर्मगुरुओं, मस्जिदों और जकात संस्थानों को अपने नियंत्रण में रखने के लिए किया।

अगले दिन 28 दिसंबर काबुल रेडियो ने बाबराक कारमल को अफ़ग़ानिस्तान का नया राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पीडीपीए का महासचिव घोषित कर दिया। इसी के साथ यह घोषणा भी कर दी गई कि आम-जन के विरुद्ध किए गए अत्याचारों की सजा देने के लिए पूर्व-प्रधानमंत्री अमीन को फ़ांसी पर लटका दिया गया है। काबुल रेडियो ने यह भी बताया कि “विदेशी दुश्मनों” की साज़िश का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए 1978 में अफ़ग़ानिस्तान और सोवियत रूस के बीच मित्रता संधि के तहत नई अफ़ग़ान सरकार ने सोवियत संघ से सैन्य सहायता और अन्य सभी प्रकार की मदद भी मांगी है।

1 जनवरी 1980 को कारमल सोवियत रूस से अफ़ग़ानिस्तान पहुँचा। अधिकांश अफ़ग़ान जनता उसे सोवियत संघ की कठपुतली ही मानती थी। वास्तव में यह धारणा सही भी थी। कारमल को सोवियत सरकार ने ही नियुक्त किया था और अफ़ग़ानिस्तान की सरकार पूरी तरह सोवियत संघ के आदेशों के अनुसार ही काम कर रही थी।

अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ का ऐसा सीधा सैन्य आक्रमण देखकर पूरा विश्व स्तब्ध रह गया। अमरीका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने इसे ‘शान्ति के लिए गंभीर खतरा’ बताते हुए सोवियत रूस के विरुद्ध कुछ प्रतिबंधों की घोषणा की। लेकिन ऐसा लगता है कि इनके कारण रूस का कम और अमरीका का नुकसान ही अधिक हुआ। उदाहरण के लिए, अमरीकी सरकार ने सोवियत संघ को होने वाले कृषि निर्यात को ढाई करोड़ टन से घटाकर केवल अस्सी लाख टन निर्यात की अनुमति दी। इससे अमरीकी किसानों को भारी नुकसान हुआ और वे इसके विरोध में खड़े हो गए। दूसरी ओर अर्जेन्टीना और कुछ अन्य देशों ने इस स्थिति का लाभ उठाकर सोवियत रूस को अमरीका के मुकाबले सस्ती दरों पर अनाज की आपूर्ति करके लाभ कमाया। अमरीका ने सोवियत रूस को तकनीक के निर्यात पर भी प्रतिबंधित लगाया था, जिसका तोड़ रूस वालों ने यूरोप से देशों से तकनीक हासिल करके निकाल लिया। 1980 में अमरीका ने मॉस्को ओलंपिक का भी बहिष्कार किया, जिसका फ़ायदा यह हुआ कि रूस वालों ने अधिक मेडल जीत लिए। 

रूसियों की यह पुरानी महत्वाकांक्षा थी कि वे अपनी सीमाओं का विस्तार करते हुए अरब सागर तक पहुँच जाएं और मध्य पूर्व के खाड़ी-क्षेत्र में उनका अपना बंदरगाह हो। अमरीका को चिंता हुई कि अफ़ग़ानिस्तान को निगलने के बाद रूस का अगला कदम शायद यही होगा कि अरब सागर तक पहुँचकर फ़ारस की खाड़ी से गुजरने वाले तेल भंडार पर कब्जा किया जाए। इसके जवाब में अमरीका ने “कार्टर सिद्धांत” को लागू करने की घोषणा की, जिसके अनुसार मध्यपूर्व या फ़ारस की खाड़ी में रूस के किसी भी दखल का अमरीकी सेना कड़ा जवाब देगी। इसी के साथ अमरीका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाना भी शुरू कर दिया। अगले एक दशक तक अमरीका की विदेश नीति रूस के प्रति इस आशंका के आधार पर ही तय होती रही।

14 जनवरी को संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह प्रस्ताव लाया गया कि सभी “विदेशी सेनाएं” तुरंत अफ़ग़ानिस्तान से लौट जाएं। इस प्रस्ताव के पक्ष में 104 और विरोध में 18 वोट पड़े। अन्य 18 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया। भारत भी उनमें से एक था। भारत सरकार का तर्क था कि भारत एक गुट-निरपेक्ष राष्ट्र है, इसलिए हम किसी के भी पक्ष या विरोध में मतदान नहीं करेंगे। लेकिन बाद में उसी वर्ष इस्लामिक कान्फ्रेंस के सदस्य देशों ने सोवियत संघ के विरुद्ध ऐसा ही प्रस्ताव पारित किया और गुट-निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों ने भी एक प्रस्ताव पारित किया।

इस प्रकार अब कई देश मिलकर धीरे-धीरे सोवियत संघ के विरुद्ध एक नया मोर्चा खड़ा करने में जुट गए थे। अमरीका की सीआईए ने भी इसके लिए बड़ी मात्रा में इन देशों को सहायता पहुँचाई। दूसरी ओर चीन भी पूरे विश्व के वामपंथी आन्दोलन का नेतृत्व सोवियत रूस के हाथों से छीनकर अपने हाथ में लेना चाहता था, इसलिए उसने भी इस रूस विरोधी आन्दोलन में अपना सहयोग दिया। चीन ने पाकिस्तान के रास्ते इस युद्ध के लिए बंदूकें, ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर और अन्य घातक हथियार उपलब्ध करवाए। लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के सैनिक पिछले कई दशकों से रूसी हथियारों का उपयोग करते आ रहे थे और उन्हीं के अभ्यस्त थे, इसलिए रूस के खिलाफ इस लड़ाई में अफ़ग़ान विद्रोहियों के अमरीका ने मिस्र, सऊदी अरब और भारत जैसे देशों के माध्यम से रूसी हथियारों की भी व्यवस्था करवाई।

इधर अफ़ग़ानिस्तान में कारमल की सरकार लोगों का समर्थन पाने के प्रयास करती रही। लगभग 8000 लोगों को जेलों से रिहा किया गया, सीमापार से वापस लौटने वाले शरणार्थियों को उनकी संपत्ति वापस लौटाने का आश्वासन दिया गया और “राष्ट्रीय एकता” को मजबूत करने के लिए सरकार में अन्य पार्टियों व गुटों के सदस्यों को भी शामिल किया गया।

लेकिन वास्तव में इन बातों का कोई लाभ नहीं था क्योंकि पूरी सरकार व प्रशासन पर असली नियंत्रण सोवियत सेना का ही था। यहाँ तक कि भोजन और ईंधन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति भी सोवियत सेना की इच्छा पर ही निर्भर थी। कारमल की सरकार भले ही लोगों को सीमापार से अफ़ग़ानिस्तान वापस लौट आने की अपील करती रही, किन्तु वास्तव में इन्हीं वर्षों के दौरान अफ़ग़ानिस्तान के लोग और भी बड़ी संख्या में देश से बाहर पलायन कर गए।

लोगों को खुश करने के लिए कारमल ने पिछली सरकार के कई आदेशों को निरस्त कर दिया। सरकार से शान्ति समझौता करने वाले कबीलों के कामकाज में दखल न देने का वचन दिया गया। पुराने भूमि-सुधार के कानून भी रद्द कर दिए गए। लेकिन इन सबका असर भी बहुत कम था क्योंकि देश का बहुत थोड़ा-सा इलाका ही सरकार के वास्तविक नियंत्रण में था। अन्य लगभग सभी इलाकों में गृह-युद्ध जैसी ही स्थिति थी।

रूसियों ने जब देखा कि अफ़ग़ानिस्तान की लगभग पूरी जनता कारमल सरकार के विरोध में है और सरकार की शक्ति लगभग शून्य है, तो उन्होंने अपने पुराने वामपंथी तरीके लागू करने का निर्णय लिया। इस अभियान का सबसे बड़ा हिस्सा था देश की युवा-पीढ़ी को अपने ढंग का इतिहास पढ़ाना और उन्हें सोवियत प्रभाव में लेना।

इसके लिए एक बड़ी योजना पर कार्य शुरू हुआ। दस वर्ष की आयु के छोटे बच्चों को प्रभावित करने के लिए “यंग पायनीयर्स” नामक अभियान चलाया गया। अगले दो वर्षों में इसमें 40000 बच्चों को जोड़ा गया। उन्हें अपने सहपाठियों और परिवार के सदस्यों की जासूसी करने की पट्टी पढ़ाई गई। पंद्रह वर्ष के किशोरों को डेमोक्रेटिक यूथ ऑर्गनाइज़ेशन से जुड़ने को कहा गया। इसके अंतर्गत उन्हें निगरानी, पहरेदारी और सोवियत संघ के समर्थन में प्रचार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती थी। इन्हीं में से प्रभावी युवाओं को चुनकर उन्हें पीडीपीए में आगे बढ़ाया जाता था।

युद्ध के कारण जो बच्चे अनाथ हो जाते थे, उन्हें पकड़कर “फादरलैंड ट्रेनिंग सेंटरों” में बंधक बनाकर रखा जाता था। प्रशिक्षण के बाद इनमें से कुछ को विद्रोही गुटों में जासूसी के लिए भेजा जाता था। इसके अतिरिक्त हजारों छात्रों को प्रतिवर्ष पढ़ाई के नाम पर सोवियत रूस भेज दिया जाता था।

स्कूलों का पूरा पाठ्यक्रम बदल दिया गया और छात्रों के रूसी भाषा सीखना व राजनैतिक कक्षाओं में उपस्थित रहना भी अनिवार्य बना दिया गया। विश्वविद्यालयों के जो भी शिक्षक वामपंथी नहीं थे, उन सभी को बर्खास्त कर दिया गया और उनकी जगह पर सोवियत समर्थक वामपंथियों को नियुक्त किया गया।

मीडिया पर भी सोवियत रूस का पूरा नियंत्रण था। टीवी पर सोवियत उत्पादों के विज्ञापनों की भरमार हो गई और केवल ऐसी फ़िल्मों की अनुमति दी जाने लगी जिनमें अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास को अपमानित किया जाता हो और सोवियत रूस को आदर्श व्यवस्था के रूप में दिखाया जाता हो।

कारमल सरकार ने इस्लाम के नाम पर भी लोगों को अपनी ओर मिलाने का भरपूर प्रयास किया। सोवियत दखल को “अल्लाह की मर्जी” बताया गया। फिर एक बार सरकारी दस्तावेजों में सबसे ऊपर “बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम” लिखा जाने लगा। नए संविधान में इस्लाम को सर्वोपरि माना गया।

ऊपरी तौर पर सरकार इन बातों का दिखावा करती रही, लेकिन परदे के पीछे उसने इस्लाम को सोवियत शैली के अनुसार परिभाषित करने का प्रयास किया। एक नए इस्लामी विभाग की स्थापना की गई और इसके माध्यम से धर्मगुरुओं और मस्जिदों को अपने अधीन लाने का प्रयास शुरू हुआ। मस्जिदों और सभी धार्मिक संस्थाओं को समाज से मिलने वाली सारी आर्थिक सहायता सरकारी नियंत्रण में ले ली गई। सभी धर्मगुरुओं को सरकारी कर्मचारी घोषित कर दिया गया।

उलेमाओं को विशेष भत्ते, अतिरिक्त राशन और अन्य आर्थिक लाभों के द्वारा खुश करने का प्रयास भी हुआ। सरकार ने हज के लिए सब्सिडी की भी घोषणा की और प्रधानमंत्री ने दावा किया कि इस्लाम के प्रचार के लिए सरकार ने कुरआन की हजारों प्रतियां भी वितरित करवाई हैं। बड़ी संख्या में धार्मिक सम्मेलन और बैठकें भी आयोजित की जाने लगीं। 

लेकिन वास्तव में यह सब दिखावा था। सरकार चाहती थी कि बदले में इस्लामी धर्मगुरु, मौलवी आदि सोवियत सरकार का समर्थन करें और लोगों को भी उसी दिशा में मोड़ें। मदरसों का पाठ्यक्रम भी बदला गया और नई पीढ़ी के “वामपंथी उलेमा” तैयार करने का प्रयास हुआ।

लेकिन इस सारी चेष्टाओं के बावजूद सरकार सफल नहीं हो सकी। लोगों ने इस्लाम की सरकारी परिभाषा को नकार दिया और इसके विपरीत धर्म के पालन और रक्षा के लिए “अल्लाहु अकबर” नाम से एक राष्ट्रीय भूमिगत आन्दोलन शुरू हो गया, जिसका उद्देश्य सोवियत सेना और उसके इशारों पर चलने वाली अफ़ग़ान सरकार को परास्त करना था। कर्फ्यू को तोड़कर हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरने लगे और घर-घर से जिहाद के नारे सुनाई पड़ने लगे।

दूसरी तरफ रूसियों और अफ़ग़ान सरकार ने भी लोगों में फूट डालने के लिए नए हथकंडे अपनाए। लोगों को भाषा और क्षेत्रवाद के नाम पर उकसाना शुरू हुआ। उज़्बेक, तुर्कमेन, बलूची, नूरीस्तानी आदि भाषाएं बोलने वाले लोग इलाकों में अधिक संख्या में थे, वहाँ अफ़ग़ानिस्तान की राष्ट्रीय भाषाओं दारी और पश्तो को हटाकर इन भाषाओं को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाया गया। रूसी पुस्तकों और पत्रिकाओं का इन भाषाओं में अनुवाद करके उन्हें लोगों में बाँटा जाने लगा। इनमें जानबूझकर ऐसे लेख लिखे होते थे, जिनमें यह दावे किए जाते थे कि ये सारे लोग वास्तव में रूसी मूल के हैं और इसलिए सोवियत रूस के साथ इनका ऐतिहासिक संबंध है। इस तरह प्रयास किया गया कि अफ़ग़ानिस्तान के लोग रूसियों को बाहरी मानना बंद कर दें और अपने ही देश को गुलाम बनाए रखने में रूसियों की मदद करें।

लेकिन इन सब बातों का भी उल्टा असर हुआ। इस्लाम अभी भी लोगों के लिए सारी बातों से ऊपर था। अपने ही धर्म के अनुयायियों के खिलाफ रूसी विधर्मियों का साथ देने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। इसके अलावा हर कबीले का अपना-अपना इलाका था, जहाँ वे किसी के अधीन नहीं थे। अब रूसियों के कहने भर से अपने पुरखों का संबंध उनसे जोड़कर स्वयं को सोवियत सेना का गुलाम क्यों बनाया जाए? इसलिए लोग और बड़ी संख्या में रूसियों के विरोधी बनते गए।

अफ़ग़ान सरकार और सेना में भी गुटबाजी और आपसी कलह बढ़ता रहा। कारमल की कोई भी नीति लोगों को अपनी ओर मिलाने में सफल नहीं हो पाई थी। पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कई लोगों तक तो किसी भी नई सरकारी योजना का कोई लाभ पहुँचा भी नहीं था। दूसरी ओर मुजाहिदीन गुटों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था और 1985 आते-आते देश की लगभग एक तिहाई जनसंख्या ईरान और पाकिस्तान में शरणार्थी के रूप में रह रही थी और इन मुजाहिदीन गुटों के समर्थन में खड़ी थी।

[मिखाइल गोरबाचेव]

सोवियत रूस को भी यह युद्ध अब भारी पड़ने लगा था। विद्रोहियों की संख्या और शक्ति दोनों बढ़ती जा रही थी और अन्य देशों से उन्हें प्रशिक्षण, आधुनिक हथियार और अन्य सभी प्रकार की मदद लगातार मिल रही थी। उनसे लड़ने के लिए सोवियत अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा था। दूसरी तरफ विश्व-भर में सोवियत संघ की निंदा हो रही थी और अधिकांश मुस्लिम देशों सहित विश्व के कई देश सोवियत सरकार के विरोध में एकजुट हो गए थे।

लेकिन इन सबके बावजूद सोवियत सरकार भी तुरंत युद्ध समाप्त करके अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने की स्थिति में नहीं थी। इसके प्रमुख नेताओं में आपसी खींचतान चल रही थी। नवंबर 1982 में उनके मुखिया ब्रेज़नेव की मृत्यु हो गई और उस पद के दोनों प्रमुख दावेदार भी बूढ़े और बीमार हो चले थे। इस आंतरिक संघर्ष के बीच 1985 में मिखाइल गोरबाचेव ने पार्टी का नेतृत्व संभाला। वे अमरीका और चीन दोनों से संबंध सुधारने के इच्छुक थे। लेकिन अभी वे अपनी सरकार और पार्टी के भीतर इतना समर्थन नहीं जुटा पाए थे कि अफ़ग़ानिस्तान से रूसी सेना हटाने के लिए अपने सहयोगियों को राजी कर पाएं।

गोरबाचेव ने अफ़ग़ान विद्रोह को कुचलने के लिए सोवियत सेनाओं को एक वर्ष का समय दिया और कारमल पर भी कुछ करने का दबाव बढ़ाया। देश के सभी गुटों और कबीलों के नेताओं को बुलाकर एक बड़ा सम्मेलन भी आयोजित किया गया, और अगस्त 1985 में राष्ट्रीय चुनाव का दिखावा भी किया गया लेकिन इनमें से कोई भी प्रयास प्रभावी नहीं सिद्ध हुआ।

अब सोवियत सरकार को विश्वास हो चुका था कि कारमल उनके किसी काम का नहीं है। इसलिए सोवियत सरकार ने मुहम्मद नजीबुल्लाह को समर्थन देना शुरू किया और अगले कुछ महीनों में नजीबुल्लाह ने धीरे-धीरे पूरी सत्ता अपने हाथ में ले ली। कारमल को निर्वासित करके मॉस्को भेज दिया गया और दस वर्ष बाद वहीं उसकी मौत हो गई।

1987 में नजीबुल्लाह ने छः माह के लिए युद्ध-विराम घोषित कर दिया और सभी कबीलों और विद्रोही गुटों और मुजाहिदीन संगठनों से बातचीत के लिए साथ जुटने की अपील की। एक राष्ट्रीय सहयोग परिषद का गठन किया गया और संसद का सत्र बुलाया गया। इस सत्र में एक नए संविधान को स्वीकृति दी गई और नजीबुल्लाह को राष्ट्रपति स्वीकार किया गया। नजीबुल्लाह ने अगले वर्ष चुनाव करवाने की भी घोषणा की। 

लेकिन रूसी अभी भी भविष्य के प्रति आशंकित थे और उन्होंने धीरे-धीरे अफ़ग़ानिस्तान से सामान बांधना शुरू कर दिया था। वैसे भी गोरबाचेव तो 1985 से ही इसके लिए प्रयासरत थे। 1986 में उन्होंने 8000 सैनिकों को वापस बुलाकर इसका संकेत भी दे दिया था। संयुक्त राष्ट्र संघ भी वापसी के लिए लगातार दबाव बना रहा था। परदे के पीछे अफ़ग़ान सरकार पाकिस्तान से भी समझौते की बातचीत कर रही थी। 

अंततः फरवरी 1988 में सोवियत सरकार ने यह घोषणा कर दी कि मई के बाद से अगले 10 महीनों में उनकी पूरी सेना अफ़ग़ानिस्तान से वापस चली जाएगी। उसी वर्ष अप्रैल में अफ़ग़ान और पाकिस्तान सरकारों ने भी एक समझौते पर हस्ताक्षर किए कि वे दोनों एक-दूसरे की सीमा में दखल नहीं देंगे। 

अगले कुछ महीनों के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ में भी इस बारे में योजनाएं बनीं कि फरवरी 1989 तक सोवियत सेना पूरी तरह अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देगी, अफ़ग़ानिस्तान के सभी शरणार्थियों को वापस अपने देश लौटाने की व्यवस्था की जाएगी और अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को अपनी लोकतांत्रिक सरकार स्वयं चुनने की पूरी स्वतंत्रता दी जाएगी। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस बात की निगरानी के लिए भी एक समूह नियुक्त किया, जो यह सुनिश्चित करेगा कि सोवियत सेनाएं तय समय-सीमा में अफ़ग़ानिस्तान से पूरी तरह बाहर निकल जाएं और देश का शासन नजीबुल्लाह सरकार को सौंप दिया जाए।

इस प्रकार फरवरी 1989 तक सोवियत सेना अफ़ग़ानिस्तान को छोड़कर चली गई। लेकिन देश में गृह-युद्ध लगातार जारी रहा और अंततः तीन वर्ष के भीतर ही नजीबुल्लाह को पद छोड़ना पड़ा व देश में मुजाहिदीन समर्थक सरकार बनी, जिसने अफ़ग़ानिस्तान को एक नया इस्लामी गणराज्य घोषित किया। उन बदलावों के बारे में भी मैं आगे लिखूँगा, लेकिन उससे पहले मैं अगले भाग में इस सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध के कुछ अन्य पहलुओं के बारे में बात करूंगा।

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