बाबर के सैन्य अधिकारी बाक़ी तश्कबन्दी का जन्म ताशकंद में हुआ था। 1526 में वह भी बाबर के साथ हिंदुस्तान पहुँचा। पानीपत में सैन्य अभियान के बाद उसे वर्तमान मप्र के चन्देरी में और फिर वहाँ से अवध में एक सैन्य अभियान के लिए भेजा गया। बाबर के आदेश पर […]

लेख के पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि सन 1973 में दाऊद खान ने अफगानिस्तान के राजा ज़हीर शाह के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया और अफगानिस्तान में राजशाही समाप्त हो गई। ज़हीर शाह उस समय इटली में थे और इस विद्रोह के कारण 2002 तक वे वहीं निर्वासन […]

८ नवंबर १९३३। काबुल के राजमहल में एक समारोह आयोजित था। इस समारोह में अफ़ग़ानिस्तान के राजा मोहम्मद नादिर शाह के हाथों नेजात हाईस्कूल के छात्रों को खेलों में अच्छे प्रदर्शन के लिए मेडल दिए जाने वाले थे। १७ साल का अब्दुल खालिक हज़ारा भी उनमें से एक था। तय […]

पिछले एक महीने से नेपाल की राजनीति में भारी उठापटक चल रही है। कुछ दिनों पहले आपने समाचार सुना होगा कि नेपाल सरकार ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई थी कि भारत सरकार दो-तीन ऐसे क्षेत्रों को अपना बता रही है जिन पर नेपाल अपना दावा करता है। इसके […]

कैब कानून लागू होने से कुछ लोग नाराज़ हैं, कुछ परेशान हैं और कुछ लोग खुश हैं। लेकिन शायद ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि इस कानून में आखिर है क्या! इसलिए मैं आज इस बारे में लिख रहा हूँ। संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 में भारत […]

इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ ही घंटों बाद 31 अक्टूबर 1984 को राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री बनाए गए। डेढ़ महीने बाद ही दिसंबर में लोकसभा चुनाव हुआ और इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर में कांग्रेस को ऐतिहासिक बहुमत मिला। लोकसभा की 541 में से […]

काँग्रेस का घोषणापत्र मैंने आज देखा। मेरी समझ में जो आया, उनमें से कुछ मुख्य बातें आपकी जानकारी के लिए यहाँ दे रहा हूँ – १. अर्द्ध-कुशल युवाओं को कोई हुनर सिखाने की बजाय काँग्रेस उनसे तालाब खुदवाएगी और बंजर जमीनों पर मजदूरी करवाएगी। इस तरह लाखों रोजगार दिए जाएँगे। […]

सन १८९७ में अंग्रेज़ों ने तिलक जी पर पहली बार राजद्रोह का मुकदमा चलाया था। मुंबई के वकील दिनशॉ डॉवर ने उनका मुकदमा लड़ा था। तब उन्हें अठारह माह की सज़ा सुनाई गई थी। अगली बार १९०८ में फिर एक मुकदमा चला। संयोग से वही दिनशॉ डॉवर अब जज बन […]

सन १८८५ में काँग्रेस की स्थापना के समय से ही इसका नियंत्रण नरम दल वाले नेताओं के हाथों में रहा था। लेकिन १९०५ में बंग-भंग की घोषणा (बंगाल का विभाजन) हुई और नरम दल वालों की सभी याचिकाओं और आवेदनों को अंग्रेज़ों ने कूड़े में दाल दिया, तब यह बात […]

(पिछले भाग यहाँ पढ़ें) लोकमान्य तिलक सन १८९० में काँग्रेस से जुड़े। उस समय काँग्रेस की नीति सरकार से याचना करने, अपनी माँगों के लिए प्रार्थना-पत्र लिखने, और ब्रिटिश शासन की कृपा के लिए धन्यवाद देते रहने की ही थी। काँग्रेस के अधिकतर नेता वाकई मानते थे कि ब्रिटिश शासन […]