अयोध्या आंदोलन का इतिहास

बाबर के सैन्य अधिकारी बाक़ी तश्कबन्दी का जन्म ताशकंद में हुआ था। 1526 में वह भी बाबर के साथ हिंदुस्तान पहुँचा। पानीपत में सैन्य अभियान के बाद उसे वर्तमान मप्र के चन्देरी में और फिर वहाँ से अवध में एक सैन्य अभियान के लिए भेजा गया।

बाबर के आदेश पर भारत में तीन मस्जिदों का निर्माण हुआ था। एक संभल में, एक पानीपत में और एक अयोध्या में।

अयोध्या वाली मस्जिद 1528 में रामकोट के एक मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। प्राचीन काल से ही हिन्दुओं की यह धार्मिक आस्था थी कि उसी मन्दिर का राम चबूतरा ही श्रीराम का जन्मस्थान था। इसलिए उस मस्जिद का ही नाम अब ‘मस्जिद-ए-जन्मस्थान’ पड़ गया। सभी ऐतिहासिक दस्तावेजों में वह मस्जिद इसी नाम से दर्ज है।

1530 में बाबर की मौत हो गई, लेकिन मस्जिद और जन्मस्थान को लेकर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष चलता रहा। आगे औरंगजेब ने रामकोट के किले को ढहा दिया। अंग्रेज और मुगल दोनो ही इतिहासकारों ने इस विवादित स्थल के बारे में विस्तार में लिखा है। कुछ इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद भी रहा कि मस्जिद बाबर ने नहीं, बल्कि औरंगजेब ने बनवाई थी, लेकिन इस बात से सब सहमत हैं कि वह मस्जिद एक हिन्दू मन्दिर को तोड़कर ही बनाई गई थी।

1853 में निर्मोही अखाड़े के सशस्त्र साधुओं ने इस परिसर पर आक्रमण करके इसे अपने अधिकार में ले लिया। अगले दो वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। अंततः प्रशासन ने इसमें दखल दिया और वहाँ कोई भी मन्दिर बनाने या उपासना करने पर प्रतिबंध लगा दिया। 1855 में फिर एक दंगा भड़का, जिसके बाद वहाँ एक दीवार बना दी गई। उसके एक तरफ मुसलमान नमाज़ पढ़ते थे और दूसरी तरफ राम चबूतरे पर हिन्दू पूजा करते थे।

1883 में उस चबूतरे पर हिन्दुओं ने मंदिर बनाने का प्रयास किया, जिसका मुस्लिम पक्ष की ओर से विरोध हुआ। विवाद के कारण 1885 में डिप्टी कमिश्नर ने वहाँ मन्दिर के निर्माण पर रोक लगा दी। इसके विरोध में राम चबूतरे के पुजारी महंत रघुबर दास ने फैजाबाद की अदालत में मुकदमा दायर किया। बदले में मस्जिद के ट्रस्टी ने भी दावा कर दिया कि वह पूरी जमीन मस्जिद की है। अदालत ने दावा खारिज कर दिया।

इसके खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने अगली अदालत में अपील की। वहाँ के अंग्रेज जज ने भी निचली अदालत का फैसला कायम रखा। जज ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से लिखा कि वह मस्जिद हिन्दुओं के पवित्र स्थल पर बनाई गई है। लेकिन अब उस इतिहास को बदलने में बहुत देर हो चुकी है, इसलिए वहाँ यथास्थिति बनाए रखी जाए।

1934 में अयोध्या के पास शाहजहांपुर गांव में गौहत्या को लेकर एक विवाद हुआ, जिसके बाद अयोध्या में भी हिन्दू-मुस्लिम दंगा भड़क गया। इस दंगे में मस्जिद को घेरने वाली दीवार तोड़ दी गई और एक गुम्बद भी क्षतिग्रस्त हो गया। बाद में अंग्रेज सरकार ने इस सबकी मरम्मत करवाई।

1936 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने राज्य में वक्फ की संपत्तियों के बेहतर रखरखाव और प्रबंधन के लिए मुस्लिम वक्फ कानून लागू किया। उसके अनुसार बाबरी मस्जिद और उसके पास स्थित कब्रिस्तान को सुन्नी वक्फ बोर्ड की संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया गया। संभवतः यही पहला दस्तावेज था, जिसमें मस्जिद-ए-जन्मस्थान के बजाय इसे बाबरी मस्जिद कहा गया था।

लेकिन मस्जिद का स्वामित्व सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिए जाने के फैसले पर शिया समुदाय ने आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि मीर बाक़ी शिया था, इसलिए मस्जिद पर शियाओं का हक है। अब वक्फ कमिश्नर ने इस विवाद के निपटारे की सुनवाई की और अंततः फैसला सुनाया कि मस्जिद को बनवाने वाला बाबर सुन्नी था, इसलिए मस्जिद पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का अधिकार सही है। शिया सेंट्रल बोर्ड ने अदालत में अपील की, लेकिन 1946 के फैसले में भी अदालत ने सुन्नियों का दावा कायम रखा।

स्वतंत्रता के बाद दिसंबर 1949 में अखिल भारतीय रामायण महासभा नामक एक संस्था ने मस्जिद के बाहर 9 दिन के अखण्ड रामायण का कार्यक्रम आयोजित किया। इसकी समाप्ति के बाद अचानक खबर फैल गई कि मस्जिद में राम और सीता की मूर्तियां प्रकट हो गई हैं। खबर सुनते ही हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लग गया। टकराव की आशंका से नेहरू सरकार ने मस्जिद को विवादित स्थल घोषित करके परिसर में ताला लगवा दिया और उप्र के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पन्त और गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को वहाँ से मूर्तियां हटवाकर मस्जिद खाली करवाने का आदेश दिया। लेकिन फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर के. के. नायर ने दंगों की आशंका से हाथ खड़े कर दिए और मूर्तियां नहीं हटवाई जा सकीं।

कुछ ही दिनों बाद गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद के न्यायालय में याचिका लगाई कि हिन्दुओं को वहाँ राम-सीता की पूजा करने दी जाए। फिर 1959 में निर्मोही अखाड़े ने भी एक याचिका दायर करके पूरे परिसर पर अपना दावा जता दिया। 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी एक याचिका लगा दी।

अप्रैल 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए जनजागरण अभियान की शुरुआत की। इसके लिए रथयात्रा की योजना बनाई गई थी, लेकिन उसी वर्ष इंदिरा गांधी की हत्या हो जाने के कारण बीच में कुछ समय के लिए इसे रोकना पड़ा।

इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला पलट दिया। लेकिन इसके कारण अब उन्हें हिन्दू वोटों के नुकसान की चिंता हुई। इसलिए अब हिन्दुओं को खुश करने के लिए रामजन्मभूमि परिसर का ताला खुलवा दिया और वहाँ हिन्दुओं को पूजा-अर्चना करने की अनुमति दे दी।

कांग्रेस हमेशा से भाजपा पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाती रहती है, लेकिन वास्तव में सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत राजीव गांधी ने पहले शाहबानो मामले में और फिर अयोध्या में ताले खुलवाकर की थी।

1989 में विश्व हिंदू परिषद को अयोध्या में कारसेवा और शिलान्यास करने की अनुमति मिल गई। उसी दौरान पिछड़े वर्ग के आरक्षण के बारे में मण्डल आयोग की रिपोर्ट आई, जिसे वीपी सिंह की सरकार ने लागू करने की घोषणा की। भाजपा को लगा कि मण्डल आयोग के बहाने सरकार देश को जातियों में और तोड़ना चाहती है, इसलिए लोगों को जोड़ने के लिए उसने राम के नाम का सहारा लिया। आडवाणी जी ने सोमनाथ से अयोध्या तक 10 हजार किमी की रथयात्रा आरंभ की, जिसे बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी जी को गिरफ्तार करके बीच में ही रुकवा दिया। इसके विरोध में भाजपा ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई। अयोध्या के नाम पर सांप्रदायिक राजनीति करते हुए राजीव गांधी के बाद अब वीपी सिंह ने बयान दिया कि मस्जिद को बचाने के लिए वे अपनी सत्ता कुर्बान कर रहे हैं।

1991 में फिर अयोध्या में कारसेवा हुई। इस बार मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने हिन्दू कारसेवकों पर गोलियां चलवाई, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। भारतीय मीडिया ने इस घटना को दबाने की पूरी कोशिश की, लेकिन स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कारण यह खबर छुप नहीं सकी। अंततः मुलायम सिंह ने भी सांप्रदायिकता का सहारा लिया और मस्जिद को बचाने के नाम पर लोगों के हत्या कांड को सही ठहराया। इसकी प्रतिक्रिया में 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने मस्जिद के ढांचे को गिरा दिया। आडवाणी जी ने इस पर शर्मिंदगी जताते हुए इसे अपने जीवन का सबसे दुखद दिन कहा।

इस घटना के बाद पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक कई जगह दंगे भड़क गए। मुंबई में दाऊद इब्राहिम के इशारे पर 12 बम विस्फोट हुए, लेकिन मुख्यमंत्री शरद पवार ने जानबूझकर फेक न्यूज़ फैलाते हुए 13 का आंकड़ा बता दिया, ताकि एक पक्ष को बचाया जा सके।

2003 में अदालत के आदेश पर एएसआई ने वहां खुदाई की। उसने अपने रिपोर्ट में बताया कि वहां हजारों साल पुराने हिन्दू मन्दिर के स्पष्ट अवशेष मिले हैं। इस बात की पुष्टि के लिए उसने कुल 1360 प्रमाण भी प्रस्तुत किये। मुस्लिम पक्ष ने इसका विरोध किया, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जांच के बाद एएसआई की रिपोर्ट को सही ठहराया।

सितंबर 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि 2.77 एकड़ के उस विवादित परिसर के तीन हिस्से किये जाएं, जिसमें से एक तिहाई रामलला को, एक तिहाई निर्मोही अखाड़े को और एक तिहाई सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंप दिया जाए।

इस फैसले के विरोध में मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया। अगस्त से अक्टूबर 2019 तक पांच जजों की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई की। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि एक ट्रस्ट का गठन करके यह पूरी जमीन हिन्दू मन्दिर के निर्माण के लिए उस ट्रस्ट की सौंप दी जाए और इसके बदले सरकार सुन्नी वक्फ बोर्ड को पाँच एकड़ भूमि मस्जिद बनाने के लिए आवंटित करे। इस तरह हिन्दुओं को अपने पवित्र स्थल पर मन्दिर बनाने की अनुमति मिल गई और 2.77 एकड़ विवादित भूमि के बदले मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ भूमि प्राप्त हो गई और सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा यह विवादित मुकदमा अंततः हल हो गया।

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