नागरिकता संशोधन अधिनियम-2019 (CAA)

कैब कानून लागू होने से कुछ लोग नाराज़ हैं, कुछ परेशान हैं और कुछ लोग खुश हैं। लेकिन शायद ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि इस कानून में आखिर है क्या! इसलिए मैं आज इस बारे में लिख रहा हूँ।
संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 में भारत की नागरिकता के नियम बताए गए हैं। ये नियम भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 के द्वारा तय किए गए हैं और समय-समय पर 1986, 1992, 2003, 2005 और 2015 में उनमें संशोधन किए गए हैं।
सन 1858 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट आया था और यहीं से भारत में ब्रिटिश राज की शुरुआत हुई थी। भारत की नागरिकता के नियम भी वहीं से शुरू होते हैं, लेकिन उस इतिहास की चर्चा यहां अनावश्यक है, इसलिए मैं 1947 के आगे की ही बात करूँगा।
15 अगस्त 1947 को इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट लागू हुआ और भारत एक ब्रिटिश डोमिनियन बन गया। ब्रिटिश राज में रहने वाले भारतीयों की तब दो श्रेणियां थीं:
  1. जो ब्रिटिश भारत में जन्मे थे और प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश शासन के अधीन आते थे
  2. जो भारतीय रियासतों में जन्मे थे और रियासतों के अधीन थे

26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और उपरोक्त में से पहली श्रेणी के लोगों को उसी दिन से भारत के नागरिकता मिल गई। लेकिन जो लोग पूर्व-रियासतों के निवासी थे, उनमें से बहुत-से लोगों ने भारत की नागरिकता नहीं ली थी। अंततः 1955 में नागरिकता कानून बनाकर उन सबको भारत की नागरिकता दी गई।

इसके बाद 1961 में भारत ने गोआ, दमन-दीव, और दादरा व नगर हवेली को पुर्तगालियों से मुक्त करके अपने अधीन किया। पांडिचेरी, कराईकल, माहे और यनम को भी फ्रांसीसियों से सन्धि के द्वारा भारत में मिलाया गया। 1975 में सिक्किम का भी भारत में विलय हुआ। बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी कुछ भूमि के विवादों को सुलझाकर वे हिस्से भारत में मिलाए गए। इन नए क्षेत्रों के लोगों को भी भारत की नागरिकता देने के लिए समय-समय पर कानून में संशोधन किए गए।

भारत की नागरिकता के कानून के अनुसार जो भी लोग 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मे हैं, वे सब जन्म के आधार पर भारत के नागरिक हैं। जो लोग 1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 तक भारत में जन्मे हैं, अगर उनके माता-पिता में से कोई भी उनके जन्म के समय भारत का नागरिक था, तो वे भी भारत के नागरिक हैं। लेकिन जो लोग 3 दिसंबर 2004 के बाद भारत में जन्मे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता केवल तभी मिल सकती है, अगर उनके जन्म के समय उनमें माता-पिता दोनों ही भारत के नागरिक थे या कोई एक भारत का नागरिक था और दूसरा अवैध घुसपैठिया नहीं था। इसी तरह के कुछ नियम उन लोगों के लिए भी हैं, जिनका जन्म भारत के बाहर हुआ था, लेकिन जिनके माता-पिता में से कोई एक या दोनों भारत के नागरिक हैं।

इसके अलावा कुछ मामलों में ऐसे लोग भी भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं, जिनका जन्म भारत के बाहर हुआ था और जिनके माता-पिता में से कोई भी भारत का नागरिक नहीं था। उदाहरण के लिए कोई विदेशी नागरिक यदि किसी भारतीय नागरिक से विवाह करे, तो वह भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है। लेकिन उसके लिए पहले उन्हें कम से कम सात साल तक भारत में वीज़ा लेकर रहना पड़ता है। भारतीय नागरिक से विवाह के बिना भी कोई विदेशी नागरिक भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है, लेकिन वह ऐसा वह कम से कम 11 साल तक कानूनन भारत में रहने के बाद ही कर सकेगा। जो लोग शरणार्थी बनकर भारत में आते हैं, उन पर भी अभी तक यही नियम लागू था।

2019 के कैब कानून के द्वारा भारत सरकार ने इस नियम में यह बदलाव किया है कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान या बांग्लादेश से जो हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई धार्मिक भेदभाव या अत्याचार के कारण भारत में शरण लेते हैं, वे इस आधार पर भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं और चूंकि ये लोग वहाँ के अत्याचारों से अपनी जान बचाने के लिए भारत आए हैं, इसलिए उन्हें 11 की बजाय 5 साल के बाद नागरिकता मिल सकती है। लेकिन अभी भी ऐसे लोगों को रातों-रात भारत की नागरिकता नहीं मिल जाएगी। एक तो उन्हें यह साबित करना पड़ेगा कि उन्हें धार्मिक आधार पर अत्याचार के कारण जान का खतरा था, इसलिए वे भारत आए हैं, दूसरा उन्हें कम से कम पाँच सालों तक शरणार्थी के रूप में नागरिकता के बिना भारत में रहना पड़ेगा और तीसरी शर्त ये है कि इस कानून के अंतर्गत नागरिकता केवल उन्हीं लोगों को मिलेगी, जो 31 दिसंबर 2014 को या उससे पहले भारत में शरण लेने आए थे। कोई व्यक्ति अगर इस तारीख के बाद भारत में आया था, तो उसे इस कानून के तहत नागरिकता नहीं मिलेगी, चाहे वह हिन्दू ही क्यों न हो और धार्मिक अत्याचार के कारण ही क्यों न भारत में शरण लेने आया हो।

यह कानून केवल 31 दिसंबर 2014 से पहले इन तीनों देशों से आए हुए धार्मिक अल्पसंख्यकों को ही नागरिकता देगा। सरकारी अनुमान के अनुसार ऐसे लोगों की संख्या लगभग तीस हजार है। इसका अर्थ यह है कि इस कानून के कारण केवल तीस हजार लोगों को नागरिकता मिलने वाली है। भारत के अधिकांश शहरों में एकाध बड़े मोहल्ले की जनसंख्या भी इससे ज्यादा होती है। इसका सीधा मतलब ये है कि पूरे भारत की 125 करोड़ जनसंख्या से तुलना करें, तो केवल मुठ्ठी भर लोगों को इस कानून से फायदा होगा।

लेकिन इन देशों के जो अल्पसंख्यक 31 दिसंबर 2014 के बाद भारत में शरण लेने आए थे, या इन देशों के जो मुसलमान किसी कारण वहाँ प्रताड़ित हो रहे हैं और भारत में शरण लेकर नागरिकता पाना चाहते हैं, उनके लिए भी दरवाजे बंद नहीं हुए हैं। पहले की ही तरह आज भी वे भारत में नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं और पात्र होने पर 11 वर्ष की अवधि के बाद उन्हें नागरिकता भी मिल सकती है, जैसी पाकिस्तान के अदनान सामी को मिली है। उनके लिए दरवाजे अभी भी खुले हुए हैं।

यह केवल नागरिकता देने वाला कानून है, छीनने वाला नहीं। इसलिए जो लोग पहले से ही भारत के नागरिक हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हैं, उनकी नागरिकता पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। यहाँ तक कि किसी पाकिस्तानी या बांग्लादेशी ने अगर फर्जी दस्तावेज बनाकर भी भारत की नागरिकता हासिल कर ली थी, तो भी इस संशोधन के द्वारा उसकी नागरिकता जाने वाली नहीं है क्योंकि यह संशोधन नागरिकता देने के नियम तय करता है, छीनने के नहीं। इसलिए भारत के जो नागरिक इस कानून के विरोध में दंगे, मारपीट, हिंसा और आगजनी कर रहे हैं, उनकी करतूत पूरी तरह गलत है और बेकार है। उन लोगों को शायद इस कानून के बारे में ढंग से कुछ पता ही नहीं है।

असम और पूर्वोत्तर राज्यों के लोग भी खूब जोर-शोर से इसका विरोध कर रहे हैं। वह विरोध भी अनावश्यक और निरर्थक है। ऐसा इसलिए क्योंकि परसों संसद में जो कानून पारित हुआ है, उसमें साफ लिखा हुआ है कि असम, मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों में यह कानून लागू नहीं होगा। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और नागालैंड के जिन इलाकों में प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट लेना पड़ता है, वहाँ भी यह कानून लागू नहीं होगा। 9 दिसंबर को ही सरकार ने यह भी घोषित कर दिया था कि मणिपुर में भी यह कानून लागू नहीं होगा। 11 दिसंबर को ही सरकार ने 1873 के बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन में संशोधन करके इस घोषणा को कानूनन लागू भी कर दिया है।

इतनी जानकारी पढ़ने के बाद आपके मन में कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि इस कानून से किसी भी भारतीय व्यक्ति की नागरिकता पर कोई खतरा नहीं है और किसी भी धर्म के व्यक्ति की नागरिकता इसके द्वारा इसके द्वारा छीनी नहीं जा सकती। इसके अलावा यह भी उल्लेखनीय है कि यह कानून अभी केवल पारित हुआ है और राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई है, लेकिन अभी यह लागू नहीं हुआ है। इसके कानूनी दस्तावेज में स्पष्ट लिखा हुआ है कि भारत सरकार राजपत्रित घोषणा के द्वारा इस कानून को भविष्य में किसी समय लागू करेगी।

मैंने यह लेख लिखने से पहले स्वयं इस कानून के दस्तावेज को पूरा पढ़ा और इंटरनेट पर उपलब्ध अन्य जानकारी का भी अध्ययन किया। उसके बाद ही मैंने यह लेख लिखा है। फिर भी जिसे इस पर अविश्वास हो, वे संसद की वेबसाइट पर जाकर कानूनी दस्तावेज डाउनलोड करके स्वयं पढ़ सकते हैं। जिसे उस पर भी विश्वास न हो, वे किसी भी बहकावे में आकर भटकते रहने को स्वतंत्र हैं। सादर!

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