सन १८९७ में अंग्रेज़ों ने तिलक जी पर पहली बार राजद्रोह का मुकदमा चलाया था। मुंबई के वकील दिनशॉ डॉवर ने उनका मुकदमा लड़ा था। तब उन्हें अठारह माह की सज़ा सुनाई गई थी। अगली बार १९०८ में फिर एक मुकदमा चला। संयोग से वही दिनशॉ डॉवर अब जज बन […]

सन १८८५ में काँग्रेस की स्थापना के समय से ही इसका नियंत्रण नरम दल वाले नेताओं के हाथों में रहा था। लेकिन १९०५ में बंग-भंग की घोषणा (बंगाल का विभाजन) हुई और नरम दल वालों की सभी याचिकाओं और आवेदनों को अंग्रेज़ों ने कूड़े में दाल दिया, तब यह बात […]

(पिछले भाग यहाँ पढ़ें) लोकमान्य तिलक सन १८९० में काँग्रेस से जुड़े। उस समय काँग्रेस की नीति सरकार से याचना करने, अपनी माँगों के लिए प्रार्थना-पत्र लिखने, और ब्रिटिश शासन की कृपा के लिए धन्यवाद देते रहने की ही थी। काँग्रेस के अधिकतर नेता वाकई मानते थे कि ब्रिटिश शासन […]

(पहला भाग यहाँ पढ़ें) पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि अंग्रेज़ अधिकारी ह्यूम को इस बारे में जानकारी मिली कि अंग्रेज़ों की क्रूरतापूर्ण नीतियों के कारण पूरे भारत में अंसतोष बढ़ रहा है और लोग फिर से १८५७ जैसी क्रांति करने की तैयारी में हैं। ह्यूम ने इस […]

3

“महारानी विक्टोरिया की… जय” २८ दिसंबर १८८५ को मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय का परिसर ब्रिटिश महारानी की जय के नारों से गूंज उठा। इसी नारे के साथ ब्रिटिश भारत में एक नई संस्था का जन्म हुआ, जिसका नाम था – इंडियन नेशनल कांग्रेस (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस)। ये नारा […]