उथल-पुथल (काँग्रेस कथा – ५)

सन १८९७ में अंग्रेज़ों ने तिलक जी पर पहली बार राजद्रोह का मुकदमा चलाया था। मुंबई के वकील दिनशॉ डॉवर ने उनका मुकदमा लड़ा था। तब उन्हें अठारह माह की सज़ा सुनाई गई थी। अगली बार १९०८ में फिर एक मुकदमा चला। संयोग से वही दिनशॉ डॉवर अब जज बन चुके थे और मुकदमा उन्हीं की अदालत में चला। इस बार मुंबई के वकील मोहम्मद अली जिन्ना ने अदालत में उनके पक्ष में पैरवी की।

यह बात बड़ी अजीब लगती है कि पहले वाले मुकदमे के दौरान तिलक जी की ज़मानत की अपील करते समय उनके वकील डॉवर ने जो तर्क अदालत के सामने रखे थे और उन्हें जमानत मिली थी, जब वही तर्क इस बार के मुकदमे में तिलक जी के वकील जिन्ना ने अदालत के सामने रखे, तो जज डॉवर ने उन्हें खारिज कर दिया और तिलक जी को जमानत नहीं मिली। ज्यूरी ने उन्हें छः वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई और बर्मा की मंडाले जेल में भेज दिया। उन पर एक हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

पहले उन्हें सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई गई थी, लेकिन यह खबर फैलते ही मुंबई सहित महाराष्ट्र के कई स्थानों पर हड़तालें और विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। अंततः उनके सश्रम कारावास को साधारण कारावास में बदल दिया गया। उन्हें जेल में पुस्तकें पढ़ने और लिखने की छूट भी दे दी गई।

इसी जेल में तिलक जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गीता रहस्य’ लिखी थी।

मंडाले के मौसम और जेल के कष्टों का बुजुर्ग तिलक जी के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। इसी दौरान उन्हें डायबिटीज ने भी जकड़ा। जून १९१४ में जब वे जेल से छूटे, तब तक काफी थक चुके थे।

लेकिन राष्ट्र के प्रति उनकी निष्ठा या अंग्रेज़ों से भारत को मुक्त करवाने के उनके इरादों पर कोई आँच नहीं आई थी। बाहर आते ही वे फिर राजनैतिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हो गए।

बीच के इन वर्षों में कुछ बड़ी घटनाएँ हुईं। मई १९०९ में ब्रिटिश संसद ने इंडियन कौंसिल्स एक्ट पारित किया था, जो ‘मॉर्ले-मिंटो सुधार’ के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध है। जैसे आज भारत में संसद और विधानसभाएँ हैं, उसी तरह अंग्रेज़ों ने कुछ स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय समितियां बनाई थीं, जिन्हें वाइसरॉय काउंसिल, प्रिवी काउंसिल आदि कहते थे। हालांकि इन संस्थाओं में मनोनीत होने वाले भारतीयों को केवल चर्चा व बहस करने और प्रश्न पूछने का ही अधिकार था, मतदान करने या कोई निर्णय लेने का नहीं। वह अधिकार ब्रिटिश सदस्यों को ही था।

काँग्रेस लगातार यह माँग करती आ रही थी कि संस्थाओं में भारतीयों की संख्या बढ़ाई जाए। १९०६ में मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद लीग ने भी यही माँग की थी कि मुसलमानों को भी इनमें विशेष प्रतिनिधित्व मिले और उनके लिए कुछ सीटें आरक्षित रखी जाएं।

मॉर्ले-मिंटो सुधार के अंतर्गत इन मांगों को माना गया। वास्तव में यह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को बढ़ाने की दिशा में ही अंग्रेज़ों का अगला कदम था।

आगा खां के नेतृत्व में जब मुस्लिम लीग का प्रतिनिधि मंडल वायसरॉय से मिला और मुस्लिमों के लिए आरक्षण की माँग की, तो जिन्ना ने इसकी कड़ी आलोचना की थी। जिन्ना का कहना था कि इससे देश की एकता कमज़ोर होगी और अलगाव की भावना बढ़ेगी। लेकिन उनकी बातों पर काँग्रेस और लीग दोनों ने ही ध्यान नहीं दिया।

बंगाल के विभाजन का विरोध अभी भी जारी था। १९११ में अंग्रेज़ों ने दो बड़े फैसले लिए। भारत की राजधानी को कलकत्ता से बदलकर दिल्ली कर दिया गया। उसी साल दिल्ली में ब्रिटिश दरबार लगा था, जिसमें ब्रिटिश महारानी और सम्राट दोनों आए थे। पूरे ब्रिटिश राज के दौरान यह उनकी एकमात्र भारत यात्रा थी। इसी आयोजन में राजधानी को कलकत्ता से बदलकर दिल्ली किए जाने की घोषणा हुई। दूसरी महत्वपूर्ण घोषणा यह थी कि अंग्रेज़ों ने बंगाल का विभाजन रदद् कर दिया। पूर्वी और पश्चिमी बंगाल को फिर से एक कर दिया गया और असम, बिहार व उड़ीसा को उससे अलग कर दिया गया।

१९०८ के बाद से गरम दल के नेताओं को कांग्रेस से बाहर निकाल दिया गया था या कुछ राजनीति से अलग हो गए थे। तिलक जी को अंग्रेज़ों ने जेल में डाल दिया था। इसके बाद से नरम दल वालों का कांग्रेस पर पूरा नियंत्रण हो गया। १९११ के अधिवेशन में कांग्रेस ने बंगाल का विभाजन रदद् किए जाने का उत्सव मनाया और इसका श्रेय भी लिया।

कांग्रेस के नेता बीच-बीच में ब्रिटेन की यात्राएं भी करते रहते थे और वहां भी भारत के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिशों में लगे रहते थे। दादाभाई नौरोजी तो वहाँ चुनाव जीतकर ब्रिटिश संसद में भी पहुंचे थे। सन १९१७ में ब्रिटेन में ही उनकी मृत्यु हो गई।

१९१४ में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत हुई। उसी वर्ष तिलक जी भी जेल से रिहा होकर वापस लौटे। १९१५ तक काँग्रेस के नरम दल के अधिकांश प्रभावी नेताओं की मृत्यु हो गई थी या वे भारत की राजनीति से हट गए थे। अब काँग्रेस में बदलाव की बातें चलने लगी थीं। १९०७-०८ की तुलना में माहौल बहुत बदल चुका था। अब काँग्रेस के संविधान में फिर से बदलाव किया गया और गरम दल के नेताओं के लिए काँग्रेस का दरवाजा फिर से खुल गया। १९१६ में तिलक जी भी काँग्रेस में वापस लौटे। दूसरी तरफ मुस्लिम लीग से भी बातचीत करने और किसी समझौते पर पहुँचने की कोशिशें जारी थीं।

१९१६ में काँग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एक बड़ा समझौता हुआ। यह समझौता लखनऊ में हुआ था, इसलिए इसे लखनऊ समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते में काँग्रेस ने मुस्लिमों के लिए अलग सीटें आरक्षित रखने की माँग मान ली। काँग्रेस ने इस बात पर भी सहमति दे दी कि अल्पसंख्यकों को उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसी तरह की कुछ और माँगों पर भी काँग्रेस ने सहमति दी। दोनों पक्षों ने साथ मिलकर अपनी मंगवाने के लिए ब्रिटिश सरकार से बात करने पर सहमति जताई।

इस बातचीत में मोहम्मद अली जिन्ना और मोहनदास गांधी दोनों शामिल थे, जिनकी अगले कुछ वर्षों में भारत की राजनीति, भूगोल और भविष्य को बदलने में बहुत बड़ी भूमिकाएं रहीं।

जिन्ना १९०४ में कांग्रेस से जुड़े। वे कांग्रेस के नरम दल में थे। शुरुआती वर्षों में जिन्ना हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थकों में से थे। १९०९ में उन्होंने मुस्लिम आरक्षण की मांग का विरोध किया, लेकिन संयोग से उसी आरक्षण का लाभ मिलने के कारण उस वर्ष वे इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए चुने गए। १९१३ में जिन्ना ने मुस्लिम लीग की भी सदस्यता ली, लेकिन उन्होंने तब स्पष्ट रूप से कहा था कि लीग की सदस्यता से ज्यादा मेरे लिए भारत की आज़ादी का महान लक्ष्य ही महत्वपूर्ण बना रहेगा।

१९१६ में ही एनी बेसेंट ने चेन्नई में होम रूल लीग की स्थापना की थी। उसी वर्ष तिलक जी ने भी पुणे में ऑल इंडिया होम रूल लीग की शुरुआत की। जिन्ना भी इसके संस्थापकों में से एक थे। बाद में ये दोनों संगठन एक हो गए क्योंकि दोनों का उद्देश्य एक ही था कि भारतीयों को भारत का शासन सौंप दिया जाए।

यह ऑल इंडिया होम रूल लीग आयरलैंड के होम रूल लीग आंदोलन से प्रेरित थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान आयरलैंड के क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया था, ताकि युद्ध में उलझे ब्रिटेन की कमज़ोरी का लाभ उठाकर आयरलैंड को आज़ादी दिलाई जा सके। दूसरी तरफ भारत में काँग्रेस के अधिकतर नेताओं ने विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों का समर्थन किया क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेज़ उनकी मांगों पर ध्यान देंगे और समर्थन के इनाम स्वरूप भारतीयों को स्वशासन का अधिकार मिलेगा। दुर्भाग्य से आयरलैंड और भारत दोनों को ही इसमें निराशा हाथ लगी।

१९१५ में गांधीजी भी दक्षिण अफ्रीका से वापस लौटे थे और कांग्रेस की गतिविधियों में सक्रिय हो गए थे। १९१६ के लखनऊ समझौते में भी वे मौजूद रहे। लेकिन काँग्रेस में और भारत की राजनीति में भी उनके वास्तविक प्रभाव की शुरुआत १९१७ में चंपारण के सत्याग्रह से हुई। १९१८ में गुजरात के खेड़ा में भी एक बड़ा सत्याग्रह हुआ था।

१९१८ में ही प्रथम विश्व युद्ध भी समाप्त हो गया। युद्ध कस दौरान अंग्रेज़ों ने आपातकाल लगाकर भारतीयों के नागरिक अधिकार और सीमित कर दिए थे। लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद भी अंग्रेज़ों ने आपातकाल नहीं हटाया, बल्कि इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने उसे और आगे बढ़ा दिया। इसके विरोध में जिन्ना ने उसकी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

१९१९ में अमृतसर के जलियांवाला बाग में अंग्रेज़ों ने क्रूरतापूर्ण हिंसक कार्रवाई करके सैकड़ों निहत्थे भारतीयों को मौत के घाट उतार दिया। इसके कारण पूरे देश में आक्रोश का माहौल था। गांधीजी ने अंग्रेज़ों के खिलाफ सत्याग्रह की घोषणा कर दी। उन्हें हिन्दुओं का समर्थन मिलना शुरू हो गया था। मुस्लिमों का समर्थन पाने की कोशिश में गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का भी समर्थन करने की घोषणा कर दी। काँग्रेस के कई नेता इससे नाराज़ हुए। जिन्ना ने भी यह कहकर गांधीजी की आलोचना की कि खिलाफत आंदोलन को सही ठहराकर गांधीजी धार्मिक कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं। गांधी की सत्याग्रह की नीति का भी जिन्ना ने विरोध किया। जिन्ना की राय थी कि भारतीयों को संवैधानिक और कानूनी लड़ाई के द्वारा स्वशासन का लक्ष्य हासिल करना चाहिए, सत्याग्रह के द्वारा नहीं क्योंकि इससे केवल अराजकता फैलेगी।

१९२० में काँग्रेस का अधिवेशन नागपुर में हुआ। गांधीजी के सत्याग्रह के प्रस्ताव का जिन्ना ने विरोध किया। लेकिन गांधीजी के समर्थकों ने जिन्ना के खिलाफ खूब नारेबाजी की और उन्हें बोलने नहीं दिया गया। सत्याग्रह के समर्थन का प्रस्ताव काँग्रेस ने पारित कर दिया। इस अपमान से आहत होकर जिन्ना ने उसी दिन से काँग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया।

आज की काँग्रेस के नेता कई बार आतंकवादियों के समर्थन में यह तर्क देते हैं कि पुलिस या सेना ने उन बेचारे युवाओं पर अत्याचार न किए होते तो वे आतंकवादी न बनते, इसलिए आतंकवाद की ज़िम्मेदार सेना और पुलिस है, आतंकवादी नहीं। उसी तर्क के अनुसार अक्सर मेरे मन में भी यह बात आती है कि काँग्रेस अगर इस तरह जिन्ना का अपमान न करती, तो शायद वे अलगाववादी राजनीति की तरफ न जाते और भारत के टुकड़े भी न हुए होते। भारत के विभाजन के लिए जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ साथ ही गांधी की कांग्रेस को भी बराबर का दोषी क्यों न माना जाए?

१९२० के इस सम्मेलन के बाद गांधीजी काँग्रेस के सबसे प्रमुख नेता के रूप में स्थापित हो गए थे। उसी वर्ष तिलक जी की भी मृत्यु हो गई।

काँग्रेस में अब गाँधी-युग की शुरुआत हो चुकी थी!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

काँग्रेस का घोषणापत्र (२०१९)

Sat Apr 6 , 2019
काँग्रेस का घोषणापत्र मैंने आज देखा। मेरी समझ में जो आया, उनमें से कुछ मुख्य बातें आपकी जानकारी के लिए यहाँ दे रहा हूँ – १. अर्द्ध-कुशल युवाओं को कोई हुनर सिखाने की बजाय काँग्रेस उनसे तालाब खुदवाएगी और बंजर जमीनों पर मजदूरी करवाएगी। इस तरह लाखों रोजगार दिए जाएँगे। […]