एक था राजा…

ब्रिटिश भारत की सैकड़ों रियासतों में से “भावल रियासत” भी एक थी।

आज यह स्थान बांग्लादेश में ढाका के पास जयदेवपुर में है। उस ज़माने में भावल रियासत पूर्वी बंगाल की दूसरी सबसे बड़ी रियासत थी। इसके अधीन हज़ारों वर्ग किमी भूमि, सैकड़ों गाँव, और लगभग पाँच लाख की जनसंख्या थी। इसकी वार्षिक आय उस ज़माने में लगभग दस लाख रुपये थी। हर लिहाज से यह एक बड़ी महत्वपूर्ण रियासत थी।

रियासत के राजा राजेन्द्र नारायण रॉय की कुल छः संतानें थीं: तीन बेटे और तीन बेटियां। सन 1901 में राजेन्द्र नारायण का निधन हो गया। इतनी कमाऊ रियासत पर अंग्रेज़ बहुत समय से नज़र गड़ाए हुए थे। मुखिया की मौत होते ही ब्रिटिश राजस्व विभाग के ‘हाउस ऑफ वार्ड्स‘ ने रियासत का कामकाज अपने नियंत्रण में ले लिया।

रानी ने इसके विरुद्ध अपील की और 1905 में अदालत ने उसके पक्ष में फैसला सुनाते हुए रियासत के कामकाज वापस भावल परिवार को सौंप दिया और परिवार के बड़े बेटे को क़ानूनी वारिस भी घोषित कर दिया गया। इसके दो ही वर्षों बाद 1907 में रानी की मौत हो गई।

पुराने समय के राजाओं और रजवाड़ों में आमतौर पर जो भी बुराइयां हुआ करती थीं, दुर्भाग्य से भावल परिवार भी उनसे अछूता नहीं था। परिवार के तीनों भाइयों को जुआ, शराब और अन्य हर तरह की लत लगी हुई थी। उनका अधिकतर समय इन्हीं बातों में गुज़रता था। हालांकि एक अच्छी बात यह थी कि वे अपनी प्रजा के प्रति कोई अन्याय नहीं करते थे और कामकाज में कोई लापरवाही नहीं बरतते थे। इसी कारण लोग भी उनका पूरा सम्मान करते थे।

कुमार रामेन्द्र नारायण रॉय (चित्र विकिपीडिया से)

फिर भी बुरी आदतों का जो परिणाम होता है, वही हुआ और 1908 में 25 वर्ष की आयु में मंझले कुमार रामेन्द्र को एक भीषण रोग ने जकड़ लिया। परिवार के डॉक्टर ने बताया कि यह सिफिलिस की बीमारी थी, जो कि यौन संक्रमण से होती है।अब कुमार का उपचार भी ज़रूरी था लेकिन इस ख़बर को गुप्त रखना भी आवश्यक था।

हवा-पानी बदलने के बहाने कुमार को दार्जिलिंग जाने की सलाह दी गई। यह सलाह उनके चिकित्सक और उनकी पत्नी विभावती देवी के भाई ने दी थी। कुमार वहाँ जाने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन पत्नी, साले और चिकित्सक के आग्रह को मानना पड़ा और नौकर-चाकरों के साथ ये सभी लोग दार्जिलिंग चले गए।

उम्मीद थी कि दार्जिलिंग के ठंडे मौसम और शुद्ध हवा से कुमार के स्वास्थ्य को लाभ मिलेगा और वो जल्दी स्वस्थ हो जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बल्कि 1909 में एक दिन अचानक ही इस बीमारी से कुमार की मौत हो गई। तब उनकी उम्र केवल 25 वर्ष थी।आनन फानन में वहीं दार्जिलिंग में अगले ही दिन उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया और सभी लोग वापस लौट आए।

अगले ही वर्ष 1910 में परिवार के सबसे बड़े भाई की और 1913 में सबसे छोटे भाई की भी मौत हो गई। तीनों ही भाइयों की कोई संतान नहीं थी। इस तरह भावल रियासत में अब कोई वारिस नहीं बचा और यह बहाना बनाकर फिर एक बार अंग्रेज़ों के कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स ने रियासत पर कब्जा कर लिया। भावल परिवार के गुज़ारे के लिए अंग्रेज़ सरकार ने एक छोटी-सी रकम मंज़ूर कर दी थी। इस तरह एक समय का शक्तिशाली और रईस ज़मींदार परिवार अब अंग्रेज़ों की दया के टुकड़ों पर जीने को मजबूर था। प्रशासन का नियंत्रण अपने हाथों में लेते ही अंग्रेज़ों ने प्रजा के कल्याण की बजाय केवल अपना राजस्व बढ़ाने पर ही ध्यान केंद्रित कर दिया और इसके लिए रियासत की प्रजा पर अत्याचारों की शुरुआत हो गई। इसी कारण लोग भी दुःखी और पीड़ित होकर जीने पर मजबूर थे।

अगले 7-8 साल इसी तरह बीतते रहे।

सन 1920 में एक दिन अचानक ढाका के लोगों को शहर में एक नागा साधु दिखाई दिया। उसके पूरे शरीर पर राख पुती हुई थी। लेकिन उसका व्यक्तित्व बड़ा विलक्षण और आकर्षक था। ऊंचा-पूरा शरीर, चौड़े कंधे, मज़बूत भुजाएं, लंबी जटाएं और चेहरे पर साधुओं जैसी लंबी दाढ़ी बरबस सबका ध्यान खींचती थी।

कई महीनों तक लगातार लोगों को वह साधु रोज़ दिखाई देता रहा। वह न किसी से बात करता था और न किसी के सवालों का कोई जवाब देता था। लेकिन इसका असर उल्टा हुआ। वह साधु अब ढाका और आसपास के इलाकों में लोगों की चर्चा का केंद्र बन गया। हर जगह उसी के बारे में बातें होने लगीं। चर्चा जितनी बढ़ती गई, उतनी ही उस साधु की प्रसिद्धि भी बढ़ती गई और लोगों में यह जानने की जिज्ञासा भी बढ़ती गई कि आखिर वह साधु कौन है, कहाँ का है और ढाका में क्यों आया है। पूरे ढाका शहर में वह नागा साधु लोगों की चर्चा का केंद्र बना हुआ था।

लोगों की जिज्ञासा जितनी ज्यादा बढ़ती गई, उतना ही ज़्यादा लोग उस साधु पर ध्यान देने लगे। कुछ लोगों को शक हुआ कि यह चेहरा कुछ जाना-पहचाना है, और फिर यह चर्चा शुरू हो गई कि कहीं यह साधु भावल रियासत के कुमार रामेन्द्र तो नहीं हैं? लेकिन ये कैसे हो सकता था? कुमार की मौत तो दस साल पहले ही दार्जिलिंग में हो चुकी थी। फिर भी चारों ओर यह बात फैल गई कि अंग्रेज़ों के कब्जे से अपनी रियासत को छुड़वाने और अपनी प्रजा को अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए भावल कुमार मौत को मात देकर वापस लौट आए हैं।

जितने लोग उतनी बातें चलने लगीं, पर वह साधु अभी भी कुछ बोलने को तैयार नहीं था। वह अभी भी मौन ही रहता था। लेकिन उसकी ख्याति फैलती रही और यह चर्चा भी ज़ोर पकड़ती रही कि वह साधु दरअसल कुमार ही है।

भावल कुमार की तीन बहनों में से एक को अपने भाई से बहुत ज़्यादा लगाव था। भाई की मौत को दस साल बीत चुके थे, लेकिन फिर भी वह आज भी उसे याद करती थी और उसके लौट आने की उम्मीद करती थी। उनका परिवार वैसे भी मानो अभिशप्त ही था। पहले पिता की मौत हुई, फिर माँ की और फिर एक-एक करके तीनों भाई भी काल के गाल में समा गए। रियासत पर ब्रिटिशों का कब्जा हो गया और भावल परिवार अंग्रेजों की कृपा का मोहताज हो गया। इससे बुरा क्या हो सकता था? पता नहीं परिवार को किसकी नज़र लग गई थी।

बहन ने सोचा कि वह साधु चाहे जो भी हो, लेकिन अगर उसके पवित्र चरण हमारी हवेली पर पड़ेंगे, तो हो सकता है कि परिवार पर लगा अपशुकन का साया हट जाए!

यह सोचकर उसने साधु को अपने घर आने की विनती की। बहुत आग्रह के बाद अंततः साधु आने को तैयार हो गया।

वहां पहुंचकर वह पूरी हवेली में घूमता रहा। ऐसा लग रहा था जैसे वहां का कोना-कोना उसका जाना-पहचाना है। घर के अन्य सदस्यों और पुराने नौकर-चाकरों ने जब उसे करीब से देखा, तो उनके अचरज का भी कोई ठिकाना नहीं रहा। उन्हें पक्का भरोसा हो गया कि यह साधु कोई और नहीं बल्कि कुमार ही है!

यह खबर आग की तरह फैल गई और धीरे-धीरे आस-पास के गांवों के लोग भी वहां जुटने लगे। कई दिनों तक वह साधु इस बात से इनकार करता रहा, लेकिन अंततः एक दिन लोगों के भारी दबाव और बहन की आत्महत्या की धमकी के कारण उसने यह स्वीकार कर लिया कि वास्तव में वह कुमार रामेन्द्र ही है!

अब लोगों की ख़ुशी का कोईं ठिकाना नहीं था। आखिर यह किसी चमत्कार से कम नहीं था कि कोई व्यक्ति मौत के बारह साल बाद इस तरह बिल्कुल नए रूप में वापस लौट आया था। अब लोगों ने कुमार को अपनी रियासत का मुखिया घोषित कर दिया और अधिकतर लोग अपना लगान अंग्रेज़ों की बजाय कुमार को ही देने लगे।

लेकिन कुमार की पत्नी विभावती देवी ने इस साधु से मिलने से इनकार कर दिया।

उनका अभी भी यही कहना था कि उनके पति की मौत बारह साल पहले ही दार्जिलिंग में हो चुकी है और यह दरअसल कोई ठग है, जो खुद को कुमार बताकर रियासत हथियाने आया है। रियासत के डॉक्टर ने भी फिर एक बार इस बात की पुष्टि की कि कुमार की मौत दार्जिलिंग में ही हो चुकी है।

अंग्रेजों का राजस्व विभाग भी यह मानने को तैयार नहीं था कि यह साधु ही कुमार है। ब्रिटिश सरकार के जासूसों ने इस मामले का सच जानने के लिए जांच शुरू कर दी। यहां तक कि उन्होंने उसके गुरु का भी ठिकाना ढूँढ निकाला और पंजाब जाकर उससे पूछताछ की। पूछताछ में उन्हें पता चला कि यह व्यक्ति कुमार नहीं, बल्कि जालन्धर के औजला गांव का माल सिंह है। अब उन्हें भरोसा हो गया था कि यह आदमी फ़र्ज़ी है और रियासत की संपत्ति हड़पने की नीयत से ही यहां आया है। हाउस ऑफ वार्ड्स ने उस व्यक्ति के सभी दावों को खारिज कर दिया।

लेकिन वह व्यक्ति भी कई तरह से और कई लोगों की पूछताछ में साबित कर चुका था कि वही कुमार है। परिवार के कई पुराने लोगों, रिश्तेदारों और नौकरों-चाकरों ने उससे उसके बचपन की और पुराने दिनों की बहुत सारी बातें पूछीं और उसने लगभग सारी बातों के जवाब बिल्कुल ठीक-ठीक दिए थे। यहां तक कि उसने कुमार के बचपन की दाई का नाम भी बिल्कुल ठीक-ठीक बताया था, जबकि वह जानकारी सार्वजनिक नहीं थी। इन बातों के कारण बहुत सारे लोग पूरे विश्वास के साथ यह मानने लगे थे कि यह व्यक्ति कुमार ही है।

स्पष्ट रूप से अब लोगों के दो गुट बन चुके थे और दोनों ही अपनी बात पर अड़े हुए थे। क्या वह व्यक्ति वाकई कुमार ही था या वह सचमुच कोई ठग था, जो कुमार बनकर रियासत की संपत्ति हथियाना चाहता था?

दोनों पक्षों के लोग अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। संन्यासी का कहना था कि वही रियासत का पूर्व राजा है। उसकी बहनें और भाभी उसके पक्ष में थीं। प्रजा का बहुत बड़ा वर्ग भी उसके समर्थन में खड़ा था। दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार का कहना था कि यह पंजाब का कोई व्यक्ति है और रियासत की जागीर हड़पने के इरादे से झूठ बोल रहा है। कुमार की पत्नी विभावती देवी और उनके भाई आदि लोग ब्रिटिश सरकार के साथ थे।

अब इस संन्यासी ने संपत्ति पर अधिकार पाने के लिए अपने दो वकीलों के मदद से ब्रिटिश कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स में मुकदमा दायर कर दिया। ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्स’ ब्रिटिश सरकार की विशेष अदालत थी, जो रियासतों के नाबालिग शासकों या वारिसों के हितों की रक्षा के नाम पर बनाई गई थी।

विभावती देवी और रियासत के वर्तमान वारिसों के विरुद्ध राजा रामेन्द्र नारायण रॉय का यह मुकदमा 24 अप्रैल 1930 को ढाका की अदालत में दायर हुआ। साढ़े तीन साल बाद 30 नवंबर 1933 को सुनवाई शुरू हुई।

इस मुकदमे के दौरान सैकड़ों लोगों की गवाहियां हुईं। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को झूठा साबित करने की पूरी कोशिश की। ब्रिटिशों ने उस संन्यासी को ठग साबित करने के लिए कई हथकण्डे अपनाए। कई गवाह खड़े किए गए, जो फ़र्ज़ी साबित हुए, कई बयान दिलवाए गए, जो झूठे निकले, कई दस्तावेज़ पेश किए गए, जो जाली थे। अंततः 20 मई 1936 को पूरी बहस खत्म हुई।

इस मामले का फ़ैसला सुनाने में न्यायाधीश महोदय ने और तीन महीनों का समय लिया। अंततः फ़ैसला सुनाने के लिए 24 अगस्त 1936 की तारीख तय हुई।

उस दिन सुबह से ही अदालत के बाहर लोगों की भारी भीड़ जमा होने लगी थी। अंतिम सुनवाई में जज ने विस्तार से पूरे मामले पर अपनी बात रखी और अंततः फैसला सुनाया कि यह संन्यासी ही वास्तव में रियासत के पूर्व राजा रामेन्द्र नारायण रॉय हैं, इसलिए रियासत की पूरी जागीर और संपत्ति उन्हें सौंप दी जाए।

इस ख़बर से रियासत के लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। लोगों ने इसे सत्य की जीत माना। बहुत-से लोगों का तो पक्का विश्वास था कि उन्हें अंग्रेज़ों के क्रूर शासन से मुक्ति दिलाने के लिए स्वयं ईश्वर ने ही राजा रामेन्द्र नारायण को वापस धरती पर भेजा है, अन्यथा दस साल पहले मर चुका व्यक्ति फिर से जीवित होकर कैसे लौट आता?

लेकिन आखिर सच क्या था? क्या वाकई राजा मरकर पुनः जीवित हो उठे थे या उस दिन दार्जिलिंग में उनकी मौत हुई ही नहीं थी?

राजा ने मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में जो बताया था, उसके अनुसार वास्तव में उस दिन दार्जिलिंग में उनकी मौत हुई ही नहीं थी। दरअसल राजा की पत्नी विभावती देवी के भाई ने राजा के निजी चिकित्सक के साथ मिलकर एक साजिश रची थी। राजा की बीमारी के कारण एक अच्छा मौका भी उन लोगों के हाथ लग गया और डॉक्टर ने राजा को स्वास्थ्य लाभ के लिए दार्जिलिंग जाने की सलाह दी। राजा को समझाया गया कि दार्जिलिंग के ठंडे मौसम में उनको ज्यादा आराम मिलेगा और रियासत से दूर जाकर इलाज करवाने से उनके गुप्त रोग की खबर भी गुप्त बनी रहेगी।

लेकिन असली इरादा राजा को खत्म कर देने का था। उन लोगों ने वहाँ राजा को ज़हर देकर मारने की कोशिश की और उन्हें मृत समझकर रातों-रात अंतिम संस्कार कर देने की योजना बनाई। शव को श्मशान तक ले जाने और जला देने के लिए कुछ किराए के लोग बुलाए गए। बेहोश राजा को मृत समझकर आधी रात के बाद श्मशान घाट पर ले जाया गया। जलाने की तैयारी शुरू हो गई। सब-कुछ बिल्कुल योजना के अनुसार हो रहा था।

लेकिन ईश्वर जिसे बचाना चाहे, उसे कौन मार सकता है!

उस रात मौसम बड़ा भयानक था। बहुत तेज़ आंधी चल रही थी और फिर अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। ऐसे मौसम में शव को जलाना असंभव था। इतनी बारिश और तूफान में खड़े रह पाना भी लोगों के लिए संभव नहीं था। इसलिए शव को वहीं ज़मीन पर छोड़कर वे सिर छुपाने के लिए इधर-उधर भागे और जहाँ जगह मिली, वहाँ उन्होंने पनाह ली।

उसी श्मशान घाट पर एक झोंपड़े में कुछ नागा साधु अपने गुरु के साथ ठहरे हुए थे। उनमें से किसी को अचानक किसी व्यक्ति के कराहने की आवाज़ सुनाई पड़ी। इसका कारण जानने के लिए दो-तीन साधु बाहर निकले। श्मशान में कुछ दूर उन्हें एक व्यक्ति कराहता हुआ दिखाई दिया। वह बहुत ज्यादा कमज़ोर और बीमार लग रहा था। शायद उसे मृत समझकर लोग वहाँ छोड़कर चले गए थे। साधुओं ने मिलकर उस व्यक्ति को उठाया और अपने झोपड़े में ले आए।

कुछ देर बाद तूफान बंद हो गया और बारिश भी थम गई। अंतिम संस्कार के लिए लाए गए लोग अब राजा के शव को जलाने के लिए वापस लौटे। लेकिन वहाँ पहुँचकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। राजा का शव वहाँ से गायब हो चुका था!

अब क्या किया जाए?

राजा के साले और डॉक्टर ने मिलकर अब एक और साज़िश रची। वहाँ पास ही कुष्ठ रोगियों का एक अस्पताल था, जहाँ अक्सर लोग अपने बीमार परिवारजनों को मरने के लिए छोड़ जाते थे। वहीं से एक लावारिस लाश चुराई गई और राजा की लाश बताकर आनन फानन में उसका दाह संस्कार कर दिया गया। इसके बाद सब लोग ढाका वापस लौट गए और रियासत की प्रजा को राजा की मौत की खबर दे दी गई।

इधर दार्जिलिंग के श्मशान घाट पर उस झोंपड़े में उन नागा साधुओं ने कई दिनों तक उस बीमार व्यक्ति की देखभाल की। जंगल की जड़ी बूटियों से उसका उपचार किया। धीरे-धीरे वह व्यक्ति स्वस्थ तो हो गया, लेकिन उसकी याददाश्त खो गई थी। वह कौन है, कहाँ का है, उसका नाम क्या है, वह वहाँ कैसे पहुँच गया था, उसे अपने बारे में कुछ भी याद नहीं था।

अब इन नागा साधुओं की टोली ही उसका परिवार थी। वह भी उनमें शामिल हो गया और अगले दस सालों तक उनके साथ ही घूमता रहा। धीरे-धीरे वह बांग्ला भाषा भी भूल गया और उनकी संगत में रहते-रहते उन्हीं के समान हिन्दी, पंजाबी और ऊर्दू में बात करने लगा।

इस तरह दस वर्षों तक भारत भर में भटकते-भटकते उन नागा साधुओं की टोली ढाका की तरफ आई। चिटगांव से ढाका का वह रास्ता न जाने क्यों उस एक साधु को अचानक ही बहुत जाना-पहचाना सा लगा। जैसे उसने शायद यह रास्ता कभी सपने में देखा हो; या शायद वह पहले भी कभी वाकई उधर से गुज़रा हो। सोचते-सोचते वह अपनी टोली के साथ ढाका की तरफ बढ़ता रहा और अचानक उसे सब-कुछ याद आ गया। वह कोई नागा साधु नहीं, बल्कि वह तो भावल की रियासत का राजा है!

उसने जब अपने गुरु को यह बात बताई, तो गुरु ने उसे वापस घर लौट जाने का आदेश दिया। परिवार शायद उसकी प्रतीक्षा कर रहा हो? वैसे भी वह संन्यासी नहीं था, न उसने संन्यास लेने के इरादे से ही सोच-समझकर अपना घर छोड़ा था, न उसे दीक्षा दी गई थी। वह तो केवल संयोग से उनकी टोली में जा मिला था। इसलिए अब उसे वापस घर लौट जाना चाहिए।

लेकिन संन्यासी अब लौटना नहीं चाहता था। परिवार और मोह माया से उनका मन उचट गया था। अपने ही भरोसे के लोगों ने जब जान से मार देने की कोशिश की थी, तो अब संन्यास की शांति को छोड़कर ऐसे स्वार्थी संसार में वापस क्यों जाना? उसने बहुत विनती की, लेकिन गुरु का आदेश टालना असंभव था। अंततः बाकी लोग आगे बढ़ गए और वह ढाका में ही रुक गया। यहीं अगले कुछ दिनों बाद लोगों का उस पर ध्यान गया और धीरे-धीरे उन्होंने उसे पहचान लिया। संसार से उसे कोई मोह नहीं था इसलिए वह लगातार इस बात से इनकार करता रहा कि वही भावल का पूर्व राजा है। लेकिन अंततः उसे सच स्वीकारना ही पड़ा और इस तरह पूरी कहानी अदालत में मुकदमे के दौरान स्पष्ट हुई।

निचली अदालत का फ़ैसला तो उसके पक्ष में आ गया था लेकिन ब्रिटिश सरकार के राजस्व विभाग ने रियासत का अधिकार वापस राजा को सौंपने से इनकार कर दिया और फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।

अब फिर मुकदमा चला।

हाईकोर्ट के जज ने पिछले मुकदमे के सारे कागजात मंगवाए। लगभग 11 हजार पन्नों की वह पूरी सामग्री फिर से छपवाई गई, ताकि हाईकोर्ट में उसे सबूत के तौर पर जमा करवाया जा सके।

इस मामले के लिए तीन न्यायाधीशों की एक विशेष खण्डपीठ का गठन किया गया। 14 नवंबर 1938 को मामले की सुनवाई शुरू हुई। 14 अगस्त 1939 को मामले की सुनवाई पूरी हुई और उनमें से एक जज सर लियोनार्ड कॉस्टेलो अपने वार्षिक अवकाश के लिए इंग्लैण्ड चले गए।

केस का फैसला छुट्टियों के बाद सुनाया जाने वाला था।

लेकिन इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया और युद्ध के कारण जज कॉस्टेलो का भारत लौटना असंभव हो गया। अगले एक वर्ष तक प्रतीक्षा करने के बाद अन्य दो न्यायधीशों ने राय दी कि मामले को अब और नहीं टाला जाना चाहिए। उन्होंने मामले के बारे में लिखित में अपनी राय जज कॉस्टेलो के निरीक्षण के लिए इंग्लैंड भिजवाई। उधर से जज कॉस्टेलो ने भी अपना निर्णय सीलबंद लिफाफे में भारत भिजवाया।

अंततः 25 नवंबर को फिर अदालत बैठी और तीनों जजों के निर्णय पढ़कर सुनाए गए। 2-1 से फैसला फिर एक बार राजा के पक्ष में आया।

अब ब्रिटिश सरकार ने इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में अपील की। युद्ध के कारण काउंसिल की इमारत क्षतिग्रस्त हो गई थी। इसलिए युद्ध खत्म होने के बाद 1945 में इंग्लैंड की संसद के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में काउंसिल की बैठक हुई और इस मामले की सुनवाई वहाँ की गई। एक साल बाद 30 जुलाई 1946 को प्रिवी काउंसिल ने अपना फैसला सुनाया और इस बार भी फैसला राजा के ही पक्ष में था।प्रिवी काउंसिल से ऊपर तो केवल ईश्वर की ही अदालत थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार के पास वहाँ अपील करने का कोई तरीका नहीं था। अंततः उसे अपनी हार माननी पड़ी और 16 साल की लंबी लड़ाई के बाद रियासत का नियंत्रण राजा रामेन्द्र नारायण रॉय को वापस मिल गया।

लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई!

उसी दिन शाम को राजा साहब अपनी बहनों और अन्य परिवारजनों के साथ पूजा करने के लिए काली मंदिर में गए। दुर्भाग्य से वहाँ उन्हें हार्ट अटैक आ गया और दो दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई।

कुछ लोगों को अब भी लगा कि शायद यह वाकई कोई ठग ही था, जिसे पहचानने में इंसानों की अदालतों ने गलती कर दी थी, इसलिए अंततः ईश्वर की अदालत ने ही उसे सज़ा दी।

मृत्यु के बाद राजा के शव का फॉरेंसिक परीक्षण करवाया गया। बहुत सालों पहले कुमार का जीवन बीमा करवाने के लिए उनकी पूरी डॉक्टरी जाँच करवाई गई थी। उस समय के रिकॉर्ड से अब इस फॉरेंसिक परीक्षण के परिणामों का मिलान किया गया। इस जाँच में पता चला कि कुमार के शरीर में उस समय दर्ज किए गए सभी 21 निशान इस संन्यासी के शरीर पर भी जस के तस मौजूद थे।

अब संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बची थी कि वाकई यह संन्यासी ही कुमार था। क्या पता शायद सचमुच संसार की मोह-माया से उसे कोई सरोकार न रहा हो, इसलिए लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अंग्रेज़ों के कब्जे से अपनी रियासत को छुड़ाकर उसने अपने लोगों के हाथों में सौंप दिया और खुद संसार के पिंजरे को तोड़कर मुक्त हो गया हो!

उसकी मौत का सच तो जो भी रहा हो, लेकिन इतिहास की यह घटना पूरी तरह सच है। अपने समय में यह मामला भारत से इंग्लैंड तक हर जगह चर्चा में रहा था और आज भी इसे कानूनी इतिहास के कुछ बहुत जटिल और चर्चित मुकदमों में से एक माना जाता है। इस कहानी पर बांग्ला भाषा में कई फिल्में भी बनी हैं, जिनमें से एक मैंने भी हाल ही में देखी थी। उसके बाद ही मुझे इतिहास की इस घटना के बारे में पता चला और मैंने फिर इसके बारे में और भी बहुत-सी जानकारी ढूँढकर पढ़ी। मुझे वाकई यह पूरा घटनाक्रम बहुत रोचक और रोमांचक लगा, इसलिए मैंने सोचा कि आपको भी इसके बारे में बताऊँ। उम्मीद है कि आपको भी यह रोचक लगा होगा।

स्त्रोत:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/Bhawal_case
2. https://youtu.be/DAhCBHmZ0Rc

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