एडोल्फ आइकमन और मोसाद

आपने एडोल्फ हिटलर का नाम तो अवश्य सुना होगा, लेकिन क्या आपने एडोल्फ आइकमन का नाम सुना है? आपने इजराइल के बारे में भी सुना होगा, लेकिन क्या आपने मोसाद का नाम सुना है? क्या आपको पता है कि इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद ने किस तरह बिल्कुल फ़िल्मी तरीके से हिटलर के साथी आइकमन को युद्ध के कई सालों बाद पकड़ा और इजराइल लाकर मौत की सज़ा दी? आइये इतिहास के इस रोमांचक अध्याय के बारे में जानें।

एडोल्फ आइकमन का जन्म 19 मार्च 1906 को जर्मनी के एक सामान्य परिवार में हुआ था। 1913-14 में उसके पिता अपने परिवार को लेकर जर्मनी से ऑस्ट्रिया चले गए और यहीं आइकमन ने अपनी पढ़ाई पूरी की। एडोल्फ को खेलों का शौक था, वह वॉयलिन भी बहुत अच्छा बजाता था, लेकिन पढ़ाई में उसकी कोई रुचि नहीं थी। इसी दौरान वह कुछ कट्टरपंथी संगठनों के संपर्क में भी आया। कुछ समय बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी और अपने पिता की खनन कंपनी में काम करने लगा। 1925 से 1927 तक उसने एक रेडियो कंपनी में सेल्स क्लर्क की नौकरी की और इसके बाद 1933 तक वह ऑस्ट्रिया की वैक्यूम ऑइल नामक एक कंपनी में काम करने लगा।

इसी दौरान उसका हिटलर की नाजी पार्टी से परिचय हुआ। नाजी पार्टी के अख़बारों को पढ़कर वह पार्टी की नीतियों के प्रति आकर्षित हुआ और एक मित्र की सलाह पर अंततः 1 अप्रैल 1932 को वह नाजी पार्टी का सदस्य बन गया। 1933 में कुछ आर्थिक कारणों से वैक्यूम ऑइल कंपनी ने अपने कुछ कर्मचारियों की छंटनी कर दी, जिसमें आइकमन की भी नौकरी चली गई। उसी दौरान ऑस्ट्रिया ने अपने देश में नाजी पार्टी की गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। इन परिस्थितियों के कारण अब आइकमन ने पुनः जर्मनी लौटने का निश्चय किया।

जर्मनी पहुंचकर उस कुछ नाजी कैंप में कुछ हफ़्तों की ट्रेनिंग ली। ऑस्ट्रिया में प्रतिबंध के बाद बड़ी संख्या में नाजी पार्टी के समर्थक जर्मनी आ रह थे। अब आइकमन को ऑस्ट्रिया से जर्मनी आने वाले नाज़ी पार्टी के इन समर्थकों की सहायता करने की ज़िम्मेदारी दी गई। सन 1934 में आइकमन को नाजी पार्टी की सुरक्षा सेवा (Security Service) में भेजा गया। छः महीनों बाद ही उसे नाजी प्रशासन के यहूदी विभाग में बुला लिया गया। 1937 में आइकमन का प्रमोशन हो गया और अब वह सेकंड लेफ्टिनेंट बन गया।

यहूदियों को जर्मनी से पूरी तरह हटा देना नाजी पार्टी की नीति का एक मुख्य लक्ष्य था। कुछ ही समय में आइकमन ने इस मामले के विशेषज्ञ के रूप में अपनी पहचान बना ली। यहूदियों को जर्मनी से जबरन खदेड़ने के लिए एक एजेंसी का गठन किया गया था। अनुमान है कि सन 1933 से 1939 तक लगभग 2,50,000 यहूदी नागरिक जर्मनी छोड़कर ऑस्ट्रिया भाग गए या खदेड़ दिए गए।

आइकमन (1942)

द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान 1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर अधिकार कर लिया। अब नाजी पार्टी ने यहूदियों के बारे में अपनी नीति में परिवर्तन करते हुए उन्हें पोलैंड भेजने का निर्णय लिया। लाखों की संख्या में यहूदियों को जर्मन शिविरों में इकट्ठा करने और फिर रेलगाड़ियों में ठूंसकर उन्हें पोलैंड तक भेजने की योजना बनाई गई। इस कार्य की ज़िम्मेदारी आइकमन को सौंपी गई। दिसंबर 1939 में उसे इस विभाग का प्रमुख नियुक्त किया गया। अगले कुछ महीनों के दौरान लाखों यहूदियों को विशेष यातना शिविरों में इकट्ठा किया गया। इन शिविरों की कुव्यवस्था के कारण हजारों यहूदियों की मौत हो गई। 15 अगस्त 1940 को आइकमन ने घोषणा की कि अगले चार वर्षों तक प्रति वर्ष एक लाख यहूदियों को जर्मनी से निकालकर अफ्रीका में मेडागास्कर भेजा जाएगा। लेकिन ब्रिटेन से लड़ाई में जर्मनी को अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिल सकी और मेडागास्कर योजना स्थगित कर देनी पड़ी। अंततः 1942 में हिटलर ने सभी यहूदियों को हत्या करवाने का निर्णय लिया। इसके लिए एक विशेष नीति बनाई गई और आइकमन को इसे पूरा करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।

आइकमन के विभाग का काम था – हर क्षेत्र में यहूदियों के बारे में जानकारी एकत्र करना, उनकी संपत्तियां जब्त करना और उन्हें शिविरों तक पहुंचाने के लिए रेलगाड़ियों की व्यवस्था करना। जर्मनी ने विश्व-युद्ध के दौरान फ्रांस और हंगरी आदि जिन देशों पर विजय पा ली थी, वहां भी यहूदियों को ख़त्म करने की योजना कार्यान्वित की गई। इनमें से कुछ यहूदियों को बंधुआ मजदूरों के रूप में रखा जाना था और शेष की हत्या करनी थी। यह पूरा ऑपरेशन आइकमन की देखरेख में चला। इस कार्य के लिए वह अगले एक माह तक हंगरी में ही रहा। जुलाई 1944 तक हंगरी के लगभग 4,37,000 यहूदियों को मार डाला गया।

द्वितीय विश्व-युद्ध में जर्मनी की हार के बाद आइकमन ने नकली दस्तावेजों की मदद से अपनी असली पहचान बदल ली और ‘ओटो एकमन’ के नाम से रहने लगा। अमरीकियों ने आइकमन को बंदी बना लिया। वह कुछ समय तक विभिन्न बंदी शिविरों में रहा। लेकिन वह जल्दी ही वहां से भाग निकलने में सफल हो गया। फिर एक बार उसने अपनी पहचान बदल ली और अब वह ‘ओटो हेनिंजर’ के नाम से रहने लगा। अगले कुछ महीनों के दौरान वह लगातार अपने ठिकाने बदलता रहा। इसी दौरान सन 1946 में प्रमुख युद्ध अपराधियों के विरुद्ध मुकदमा शुरू हुआ। आइकमन के खिलाफ भी पर्याप्त सबूत प्रस्तुत किए जा चुके थे, हालांकि वह अभी फरार था।

आइकमन का फर्जी पासपोर्ट

सन 1948 में आइकमन इटली के बिशप एलोइस हुडल की सहायता से अर्जेंटीना में प्रवेश का परमिट मिल गया। अब उसका नया नाम ‘रिकार्डो क्लेमेंट’ था। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वह रेड क्रॉस के माध्यम से इसी फर्जी नाम से एक पासपोर्ट प्राप्त करने में भी सफल हो गया। यूरोप में कई स्थानों पर छिपते-छिपाते अंततः 14 जुलाई 1950 को वह अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनोस आयर्स पहुँच गया।

अर्जेंटीना आने पर कुछ समय तक वह तुकुमान प्रांत में एक सरकारी ठेकेदार के रूप में काम करता रहा। सन 1952 में उसने अपने परिवार को भी अर्जेंटीना बुलवा लिया और अब वे लोग ब्यूनोस आयर्स में रहने लगे। कुछ समय तक कई छोटी-मोटी नौकरियां करने के बाद उसे मर्सीडीज-बेंज़ कंपनी में डिपार्टमेंट हेड की नौकरी मिल गई। सन 1960 में इस परिवार ने अर्जेंटीना में अपना घर भी बनवा लिया।

सन 1945 में द्वितीय विश्व-युद्ध की समाप्त हुआ और 1948 में यहूदियों को उनका अपना देश इजराइल भी मिल गया। लेकिन जर्मनी में नाजी अधिकारियों द्वारा किए गए अत्याचार को यहूदी भूले नहीं थे। इनमें से कई लोगों ने उन नाजी हत्यारों को ढूंढना और सज़ा देना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। ये लोग ‘नाज़ी हंटर्स’ (नाज़ियों के शिकारी) कहलाते थे। इन्हीं में से एक साइमन वीसेंथल को 1953 में खबर मिली कि आइकमन को अर्जेंटीना में देखा गया है। वीसेंथल ने 1954 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना के इजराइली दूतावास को इसकी जानकारी दे दी। लेकिन इस बात की पुष्टि करना आवश्यक था कि वह व्यक्ति आइकमन ही है, उसका भाई नहीं। इजराइल के पास उसके केवल पुराने चित्र ही उपलब्ध थे। सन 1960 में जब आइकमन के पिता की मृत्यु हुई, तो उनकी अंतिम-यात्रा के दौरान आइकमन के फोटो खींचने के लिए वीसेंथल ने कुछ निजी जासूसों को नियुक्त किया। इसके बाद उसने इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद को वे फोटो उपलब्ध करवा दिए।

मोसाद प्रमुख आइज़र हैरल

आइकमन की पहचान करने में एक अन्य यहूदी लोथार हरमन की भी मदद मिली। हरमन 1938 में जर्मनी से अर्जेंटीना चला गया था। हरमन की बेटी सिल्विया 1956 में क्लॉस आइकमन नामक एक युवक के साथ डेटिंग करने लगी थी। क्लॉस अक्सर अपने पिता के नाज़ी संपर्कों और कार्यों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर गर्व से बताया करता था। इसका पता चलते ही हरमन ने तुरंत पश्चिमी जर्मनी में न्यायाधीश फ्रिट्ज बॉयर को इसकी सूचना दी। अब सच का पता लगाने के लिए सिल्विया को क्लॉस के घर भेजा गया। संयोग से दरवाजा एडोल्फ आइकमन ने ही खोला, किन्तु उसने स्वयं को क्लॉस का चाचा बताया। क्लॉस उस समय घर पर मौजूद नहीं था। सिल्विया उसकी प्रतीक्षा में वही रुकी रही, किन्तु जब क्लॉस घर लौटा, तो उसने सिल्विया से एडोल्फ का परिचय अपने पिता के रूप में करवाया। बॉयर ने 1957 में यह जानकारी मोसाद के मुखिया आइजर हैरल तक पहुँचा दी।

अब हैरल ने अपने ख़ुफ़िया एजेंटों को इस मामले में पर्याप्त सबूत जुटाने की ज़िम्मेदारी सौंपी, लेकिन उन्हें ख़ास सफलता हाथ नहीं लगी। अतः 1 मार्च 1960 को हैरल ने इजराइल की सुरक्षा एजेंसी शिन बेत के एक प्रमुख अधिकारी ज्वी आहरोनी को ब्यूनोस आयर्स भेजा। आहरोनी ने कुछ ही हफ़्तों में पुष्टि कर दी कि यह व्यक्ति एडोल्फ आइकमन ही है।

अब अगली चुनौती उसे इजराइल लाने की थी। अर्जेंटीना इससे पूर्व कई नाज़ी युद्ध-अपराधियों को सौंपने के अनुरोध ठुकरा चुका था। इसे देखते हुए इजराइल के प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन ने तय किया कि अर्जेंटीना से प्रत्यर्पण का आधिकारिक अनुरोध करने के बजाय एक ख़ुफ़िया ऑपरेशन के द्वारा आइकमन का अपहरण करके उसे इजराइल लाया जाए और उस पर युद्ध अपराध का मुकदमा चलाया जाए। अतः इस मिशन के लिए मोसाद के ख़ुफ़िया एजेंट रफ़ी ईटन के नेतृत्व में आठ लोगों की टीम बनाई गई, जिनमें से अधिकांश शिन बेत के एजेंट थे।

आइकमन की पहचान की पुष्टि हो जाने पर अप्रैल 1960 में ही यह टीम ब्यूनोस आयर्स पहुँच गई थी। आइकमन ब्यूनोस आयर्स के उत्तर में लगभग 20 किमी की दूरी पर स्थित एक औद्योगिक इलाके सैन फर्नान्डो में रहता था। मोसाद की टीम ने कई दिनों तक आइकमन पर नज़र रखी और उसकी दिनचर्या का पता लगाया। उन्होंने पाया कि हर शाम लगभग एक ही समय पर आइकमन बस से अपने घर लौटता था। बस स्टॉप से उसके घर तक वह पैदल ही जाता था। इस रास्ते में एक खुला मैदान भी पड़ता था, जो अक्सर सुनसान ही रहता था। टीम ने इसी जगह से आइकमन का अपहरण करने की योजना बनाई।

इजराइली प्रधानमंत्री बेन-गुरियन

मई 1960 में हैरल खुद इस पूरे मिशन की निगरानी के लिए ब्यूनोस आयर्स पहुंचे। अपहरण के लिए 11 मई का दिन तय किया गया। टीम अपनी पोजीशन पर तैनात हो गई। आइकमन रोज जिस बस से घर लौटता था, वह बस भी नियत समय पर आकर बस स्टॉप पर रुकी और आगे बढ़ गई। लेकिन आइकमन उस बस में था ही नहीं! निराश होकर टीम ने योजना लगभग रद्द कर दी थी। लेकिन लगभग आधे घंटे बाद ही आइकमन अगली बस से उतरता हुआ दिखाई दिया। टीम के सभी सदस्य पुनः सतर्क हो गए। एक मोसाद एजेंट पीटर माल्किन आगे बढ़ा और आइकमन को बातों में उलझाने के लिए उसने स्पेनिश भाषा में आइकमन से कुछ पूछा। आइकमन को तुरंत ही कुछ शक हो गया था। घबराकर उसने वहां से भागने की कोशिश की, लेकिन तभी दो अन्य एजेंट भी माल्किन की सहायता के लिए पहुँच गए और तीनों ने मिलकर उसे जमीन पर गिरा दिया। कुछ देर चले संघर्ष के बाद वे उसे दबोचने में सफल हो गए। पास ही एक कार तैयार खड़ी थी। आइकमन को कार के फर्श पर लिटाकर कंबल से ढंक दिया गया। मोसाद ने कई सुरक्षित ठिकाने पहले ही तैयार रखे थे। उन्हीं में से एक में आइकमन को लाया गया। यहां उसे नौ दिनों तक बंदी बनाकर रखा गया। इस दौरान मोसाद ने फिर एक बार उसकी पहचान की पुष्टि कर ली क्योंकि यदि किसी गलत व्यक्ति को इजराइल ले जाते, तो पूरी मेहनत ही बेकार हो जाती!

उन्हीं दिनों अर्जेंटीना की स्पेन से आजादी के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अर्जेंटीना में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए कुछ ही दिनों पहले इजराइल का एक सरकारी प्रतिनिधिमंडल विशेष विमान से अर्जेंटीना पहुंचा था। 20 मई को एक इजराइली डॉक्टर ने आइकमन को बेहोशी का इंजेक्शन लगाया और इजराइली प्रतिनिधिमंडल के इसी विशेष विमान से आइकमन को भी विमान कर्मचारी के भेस में अर्जेंटीना से निकाल लिया गया। 22 मई को टीम इजराइल पहुंची। उसी दिन प्रधानमंत्री ने संसद में आइकमन की गिरफ्तारी की घोषणा कर दी।

अपनी भूमि से आइकमन का इस तरह अपहरण हो जाने की खबर सुनकर अर्जेंटीना बौखला गया। अर्जेंटीना ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन माना। अर्जेंटीना की सरकार ने इजराइल से अपनी आपत्ति जताई। अर्जेंटीना में इजराइल के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन भी हुए। लेकिन इजराइल किसी दबाव में नहीं झुका। अंततः हारकर अर्जेंटीना ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने की मांग की। इस बैठक में इजराइल के प्रतिनिधि ने तर्क दिया कि अर्जेंटीना में हुई घटना केवल किसी व्यक्ति की निजी दुश्मनी का नतीजा थी और इजराइल की सरकार या ख़ुफ़िया एजेंसी का इसमें कोई हाथ नहीं है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 23 जून के अपने निर्णय में यह माना कि अर्जेंटीना के क़ानून का इजराइल द्वारा जानबूझकर उल्लंघन किया गया था। अंततः कई दौर की बातचीत के बाद 3 अगस्त को इजराइल और अर्जेंटीना में समझौता हो गया। इजराइल ने स्वीकार किया कि अर्जेंटीना की संप्रभुता का उल्लंघन हुआ था और इस तरह विवाद का अंत हो गया।

इजराइल में मुकदमे के दौरान आइकमन (1961)

आइकमन को उत्तरी इजराइल के यागुर के एक सुरक्षित पुलिस थाने में कड़ी सुरक्षा के बीच नौ माह तक रखा गया। इस दौरान उससे लगातार पूछताछ होती रही और अंततः 3500 पन्नों की एक रिपोर्ट तैयार की गई। अप्रैल 1961 में आइकमन का मुकदमा शुरू हुआ। इजराइली सरकार ने इस बात की पूरी व्यवस्था की थी कि इस मुकदमे को मीडिया में व्यापक कवरेज मिले। पूरी दुनिया के अख़बारों में इस मुकदमे की चर्चा होने लगी। लगभग 750 पत्रकार अदालत परिसर में बैठकर सीसीटीवी के माध्यम से मुकदमे की कार्यवाही देखते थे। अमेरिका की एक न्यूज एजेंसी से इस मुकदमे के वीडियो प्रसारण का एक्सक्लूसिव अधिकार प्राप्त कर लिया था। हर दिन की कार्यवाही के बाद उस दिन का वीडियो टेप हवाई जहाज से अमेरिका भेजा जाता था और अगले दिन समाचार चैनल पर उसका प्रसारण होता था।

इस मुकदमे की कार्यवाही 56 दिनों तक चली और इस दौरान सबूतों के रूप में सैकड़ों पन्नों के दस्तावेज़ और 112 गवाह अदालत में पेश किए गए। अंततः 15 दिसंबर 1961 को एडोल्फ आइकमन को फांसी की सज़ा सुनाई गई। आइकमन ने इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की। वहां भी उसकी याचिका खारिज कर दी गई और अंततः 31 मई 1962 की आधी रात के कुछ ही मिनटों बाद उसे रामला की जेल में फांसी दे दी गई। फांसी के बाद चार घंटों के भीतर ही उसके शव को एक गुप्त स्थान पर ले जाकर जला दिया गया और उसकी राख इज़राइली नौसेना ने इज़राइल की समुद्री सीमा के बाहर ले जाकर भूमध्य सागर में बहा दी। इस तरह नाजी आतंक के एक सदस्य का अंत हुआ।

आइकमन का मामला कई तरह से एक मिसाल बन गया है। यह युद्ध-अपराध की अदालती कार्यवाहियों के संदर्भ में एक ऐतिहासिक मामला था। एक देश की ख़ुफ़िया एजेंसी ने जिस तरह दूसरे देश में जाकर गुप्त ऑपरेशन पूरा किया, इसके कारण यह मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी पहुंचा। दुनिया-भर के मीडिया में भी इसकी बहुत चर्चा चली। इसी वर्ष 2015 में ब्रिटेन के यूके टेलीविजन ने ‘द आइकमन शो’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई थी। अपनी मौत के इतने वर्षों बाद भी आइकमन का नाम आज भी चर्चा में रहता है और भविष्य में भी जब-जब इस तरह के मामले याद किए जाएंगे, तब आइकमन का नाम भी उनमें शामिल रहेगा!

स्त्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Adolf_Eichmann और https://www.flickr.com/photos/huntingtontheatreco/6238852798

3 thoughts on “एडोल्फ आइकमन और मोसाद”

  1. इसे पढ़कर ऐसा लगा मानों सारे दृश्य आँखों के सामने तैर रहे हों. इस तरह से इतिहास पढ़ना वाकई में दिलचस्प अनुभव है…

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