नेताजी और कांग्रेस

सन 1921 में भारत में ‘असहयोग आन्दोलन‘ चल रहा था। उसी आन्दोलन से प्रेरित होकर 25 वर्ष के नवयुवक सुभाषचंद्र बोस भी लंदन से भारत लौट आए थे। 16 जुलाई को मुंबई पहुंचते ही वे गांधीजी से मिलने मणिभवन गए। वे अपने तीन प्रश्नों के बारे में गांधीजी के विचार जानना चाहते थे:

  1. यह असहयोग आन्दोलन अपने अंतिम चरण तक कैसे पहुंचेगा?
  2. ब्रिटिश सरकार का बहिष्कार करने से भारत की आज़ादी के लिए आवश्यक दबाव कैसे बनेगा?
  3. गांधीजी ने भारत को एक साल में स्वतंत्रता दिलाने का आश्वासन किस आधार पर दिया था?

पहले प्रश्न के लिए तो गांधीजी के जवाब से नेताजी संतुष्ट हुए, किन्तु अन्य दो प्रश्नों का उन्हें संतोषप्रद उत्तर नहीं मिला, बल्कि उन्हें गांधीजी की बातें सुनकर घोर निराशा हुई। उन्हें लगा कि गांधीजी के विचार ही अस्पष्ट हैं या वे जानबूझकर आधे-अधूरे उत्तर दे रहे हैं, ताकि उनकी विशिष्टता का आभामण्डल बना रहे। गांधीजी अपने अनुयायियों से पूर्ण समर्पण की अपेक्षा रखते थे, लेकिन बोस को यह स्वीकार नहीं था कि वे गुणों को परखे बिना ही किसी को बिना शर्त अपना नेता मान लें। संभवतः इस पहली मुलाकात से ही दोनों के मतभेदों की शुरुआत भी हो गई थी।

इस मुलाकात के बाद नेताजी बंगाल चले गए। बंगाल में असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व देशबंधु चित्तरंजन दास के पास था। उनसे नेताजी का पूर्व-परिचय था। उनके व्यक्तित्व से सुभाषचंद्र बोस बहुत प्रभावित हुए। देशबंधु की प्रेरणा से वे  पूरे उत्साह से बंगाल में कांग्रेस के प्रचार में जुट गए। उसी वर्ष नेशनल कॉलेज की भी स्थापना हुई थी। सुभाषचंद्र बोस को उसका प्राचार्य भी नियुक्त किया गया।

असहयोग आन्दोलन अभी भी जारी था। नवंबर में गांधीजी ने ‘जेल भरो’ की अपील की। अंग्रेज सरकार ने भी आंदोलन को गैर-कानूनी घोषित करके कांग्रेस नेताओं और समर्थकों की गिरफ्तारी शुरू कर दी थी। दिसंबर में नेताजी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। यह उनकी पहली जेल यात्रा थी। चित्तरंजन दास भी कारागार में ही थे।

उसी वर्ष क्रिसमस के समय प्रिंस ऑफ़ वेल्स की भारत यात्रा का कार्यक्रम बना था। वायसरॉय लॉर्ड रीडिंग का समझौते का प्रस्ताव लेकर पण्डित मदन मोहन मालवीय जेल में चित्तरंजन दास से मिले। यदि कांग्रेस प्रिंस ऑफ़ वेल्स की यात्रा के बहिष्कार की योजना रद्द कर दे, तो सरकार असहयोग आंदोलन के सभी बंदियों को रिहा करने और भारत के भविष्य की चर्चा करने के लिए गोलमेज परिषद का आयोजन करने को राजी थी।

चित्तरंजन दास ने जेल में सुभाषचंद्र बोस और अन्य सहयोगियों से चर्चा की। सबकी यही राय बनी कि कांग्रेस को प्रस्ताव मान लेना चाहिए क्योंकि गांधीजी ने एक वर्ष में स्वतंत्रता दिलाने का जो आश्वासन दिया था, उसके पूरा होने की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं थी। उससे अच्छा यही है की समझौते की चाल चली जाए और फिर जेल से रिहा होकर आगे की रणनीति बनाई जाए। लेकिन समझौते को स्वीकार करने का चित्तरंजन दास का सुझाव गांधीजी ने ख़ारिज कर दिया। बोस की राय थी कि गांधीजी की यह भूल बहुत भारी पड़ने वाली है।

दो माह बाद ही फरवरी 1922 में एक उग्र भीड़ ने गोरखपुर के चौरीचौरा में पुलिस थाने को जला दिया, जिसमें 21 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। इस हिंसा से हताश होकर गांधीजी ने अचानक ही आंदोलन रोक देने की एकतरफ़ा घोषणा कर दी। एक साल में स्वतंत्रता के दावे वाला आंदोलन कुछ भी हासिल किए बिना समाप्त हो गया। गांधीजी ने इस निर्णय के बारे में किसी से कोई राय नहीं ली थी। स्वाभाविक रूप से सुभाषचंद्र बोस जैसे नेता इससे बहुत निराश थे। आंदोलन की समाप्ति के बाद सभी नेताओं को भी जेल से रिहा कर दिया गया। 

अगले वर्ष 1923 में नेताजी अखिल भारतीय युवक कांग्रेस के अध्यक्ष और बंगाल प्रदेश कांग्रेस के सचिव बने। कोलकाता नगर निगम के चुनाव में चित्तरंजन दास की विजय के बाद 1924 में नेताजी ने नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी का दायित्व संभाला। लेकिन अगले वर्ष ही सरकार ने फिर एक बार राष्ट्रवादियों की गिरफ्तारी शुरू कर दी और इन दोनों नेताओं को भी बंदी बना लिया गया। सुभाषचंद्र बोस को पहले अलीपुर और फिर बर्मा में मंडाले की जेल में भेज दिया गया और यहीं वे टीबी की चपेट में आ गए। 1925 में चित्तरंजन दास का निधन भी उनके लिए एक बड़ी क्षति थी।

1927 में जेल से रिहाई के बाद बोस कांग्रेस के महासचिव निर्वाचित हुए। उसी वर्ष कांग्रेस में एक उल्लेखनीय घटना हुई। कांग्रेस के नेता मोतीलाल नेहरू चाहते थे कि उनके पुत्र जवाहरलाल को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाए। उन्होंने गांधीजी से इस बात के लिए आग्रह किया। लेकिन गांधीजी ने मना कर दिया। उनकी राय थी कि अभी ऐसा करना जल्दबाजी होगी।

अगले वर्ष 1928 के कांग्रेस अधिवेशन से पहले मोतीलाल नेहरू ने फिर वही मुद्दा उठाया। गांधीजी शायद मान जाते, लेकिन इस बार अधिवेशन बंगाल में होना था, इसलिए बंगाल के कांग्रेस नेताओं की राय जानना उनकी मजबूरी थी। बंगाल के नेताओं ने मोतीलाल नेहरू का नाम चुना।

सन 1929 में फिर एक बार अध्यक्ष पद के लिए जवाहरलाल नेहरू का नाम आया। लेकिन सरदार पटेल भी अध्यक्ष पद के एक और दावेदार थे। गांधीजी इस बात को समझते थे कि पटेल के सामने नेहरू की जीत संभव नहीं है, इसलिए गांधीजी ने ही एक नई चाल चली। उन्होंने अध्यक्ष पद के लिए अपना भी नाम घोषित कर दिया।

दस प्रदेश कांग्रेस समितियों ने गांधीजी के नाम का समर्थन किया। सरदार पटेल को पांच और नेहरू जी को केवल तीन वोट मिले। सबसे अधिक वोट पाने के कारण गांधीजी को विजयी घोषित कर दिया गया, लेकिन उन्होंने अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया और युवाओं को आगे बढ़ाने के नाम पर नेहरू जी को अध्यक्ष घोषित कर दिया गया।

मार्च 1930 में गांधीजी ने दांडी यात्रा आयोजित की और उसके साथ ही सविनय अवज्ञा आन्दोलन का भी प्रारंभ हुआ। आंदोलन के कारण फिर एक बार अन्य नेताओं के साथ ही नेताजी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। अगले तीन वर्षों तक उनकी गिरफ्तारी और रिहाई का सिलसिला चलता रहा।

जेल के कष्टों का उनके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। जेल प्रशासन ने उन्हें अस्पताल में रखा, लेकिन उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो रहा था। ब्रिटिश सरकार को चिंता हुई कि यदि जेल में उन्हें कुछ हो गया, तो बंगाल में लोगों का गुस्सा फूट पड़ेगा। इससे बचने के लिए सरकार ने रिहाई का प्रस्ताव दिया लेकिन साथ ही यह शर्त रखी कि नेताजी उपचार के लिए यूरोप चले जाएं।

पिछली बार भी बर्मा के कारावास में अंग्रेजों ने उन्हें यही प्रस्ताव दिया था, किन्तु उन्होंने तब वह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। लेकिन अब वे स्वयं ही गांधीजी के नेतृत्व वाली कांग्रेस से निराश होते जा रहे थे। वे कांग्रेस में अपने आप को अलग-थलग महसूस कर रहे थे। अंततः उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और मार्च 1933 में नेताजी उपचार के लिए यूरोप के विएना चले गए। यहीं सरदार पटेल के बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल से उनकी मित्रता हुई। वे भी गांधीजी की कार्यशैली से नाखुश थे। बोस और पटेल ने एक संयुक्त वक्तव्य भी जारी किया कि गांधीजी का नेतृत्व विफल हो चुका है और एक नए नेता का चुनाव करके कांग्रेस का पुनर्गठन किया जाना चाहिए।

अगले कुछ वर्षों तक नेताजी यूरोप में ही रहे। इसी दौरान उन्होंने ‘द इण्डियन स्ट्रगल’ नाम से एक पुस्तक भी लिखी। यह 1935 में लंदन में प्रकाशित भी हुई, लेकिन जल्दी ही ब्रिटिश सरकार ने भारत में इसे प्रतिबंधित कर दिया।

इतने वर्षों तक भारत से बाहर रहने के बावजूद भी भारत में सुभाषचंद्र बोस का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था और कांग्रेस में उनके समर्थक नेताओं की संख्या भी लगातार बढ़ रही थी। अब उन्हें रोक पाना गांधीजी के लिए भी संभव नहीं था।

1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए सुभाषचंद्र बोस का नाम प्रस्तावित हुआ और वे जीते भी। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अपनी दिशा बदलनी चाहिए और केवल स्वायत्तता नहीं बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना चाहिए भले ही इसके लिए अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध क्यों न छेड़ना पड़े। स्पष्ट रूप से यह गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत को खुली चुनौती थी।

1939 में फिर एक बार ऐसी ही स्थिति बनी। उस समय पूरी दुनिया पर विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। ऐसे समय में ब्रिटिश सरकार का विरोध किया जाए या युद्ध में समर्थन के बदले आज़ादी की शर्त रखी जाए, इस बात को लेकर कांग्रेस बंटी हुई थी। सुभाषचंद्र बोस अंग्रेज़ों से आर-पार की लड़ाई के पक्षधर थे, लेकिन गांधीजी का खेमा अंग्रेज़ों से समझौता करना चाहता था।

उस वर्ष कांग्रेस का अधिवेशन मप्र में जबलपुर के त्रिपुरी में होना था। बोस भी फिर एक बार अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ना चाहते थे क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन को अपने अनुसार चलाने के लिए यह चुनाव जीतना आवश्यक था।

गांधीजी अब खुलकर उनके विरोध में आ चुके थे। लेकिन शायद गांधीजी यह महसूस करने लगे थे कि वे स्वयं भी चुनाव में खड़े हो जाएं, तो भी बोस को हरा नहीं पाएंगे। इसलिए उन्होंने कांग्रेस के अन्य नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए मनाने का प्रयास किया। लेकिन कांग्रेस का कोई भी नेता बोस के खिलाफ चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। अंततः गांधीजी पट्टाभि सीतारमैया को मनाने में सफल हो गए। गांधीजी ने भावनात्मक अपील भी कर दी कि चुनाव में सीतारमैया की हार स्वयं मेरी हार होगी। लेकिन इसके बावजूद भी वे सफल नहीं हो पाए

सुभाषचंद्र बोस ने पट्टाभि सीतारमैया को 203 वोटों से हरा दिया। इसके विरोध में गांधीजी ने अधिवेशन का बहिष्कार कर दिया और जबलपुर आने की बजाय वे राजकोट चले गए।

उन दिनों सुभाषचंद्र बोस इतने ज्यादा बीमार थे कि उन्हें सम्मेलन स्थल तक स्ट्रेचर पर लाना पड़ा। साथ में दो डॉक्टर भी थे। इस जीत की ख़ुशी में जबलपुर में एक विशाल जुलूस का आयोजन हुआ, जिसमें 52 हाथियों को सजाया गया था। सुभाषचंद्र बोस बीमार होने के कारण जुलूस में शामिल नहीं हो सके। इसलिए हाथी पर उनकी फोटो रखी गई थी। उस फोटो को देखने के लिए भी हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। इससे कांग्रेस नेताओं को बोस की लोकप्रियता का अंदाजा हो गया, लेकिन साथ ही अपने राजनैतिक भविष्य की चिंता भी सताने लगी। इस बात में कोई संशय नहीं रह गया था कि यदि ऐसा चलता रहा तो आज़ादी मिलने के बाद बोस को प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।

जल्दी ही कुछ करना आवश्यक हो गया था। नेताजी की जीत के विरोध में कांग्रेस की कार्यसमिति के पंद्रह में से बारह सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिया। इनमें सरदार पटेल, मौलाना आजाद और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेता भी थे। जवाहरलाल नेहरू ने इस्तीफा तो नहीं दिया, लेकिन ऐसा बयान जारी कर दिया जिससे यह स्पष्ट हो जाए कि वे भी नए अध्यक्ष को कोई सहयोग नहीं देंगे। कांग्रेस के इस असंतोष को मुद्दा बनाकर गांधीजी ने भी राजकोट में आमरण अनशन की घोषणा कर दी।

अंततः देश-हित को बचाने के नाम पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस को ही तीन वर्ष के लिए कांग्रेस कार्यसमिति से निष्कासित कर दिया गया। उसके कुछ ही समय पूर्व उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही ऑल इण्डिया फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना भी की थी। अब वे फॉरवर्ड ब्लॉक के माध्यम से अपना काम आगे बढ़ाना चाहते थे, लेकिन उसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया और अंग्रेज सरकार ने उन्हें नजरबंद कर दिया।

उसी नजरबंदी के दौरान 1941 में अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर वे अफगानिस्तान और सोवियत रूस के रास्ते जर्मनी जा पहुंचे। वहां से 1943 में वे जापान गए और आज़ाद हिन्द फौज की कमान संभाली। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक निर्णायक मोड़ था।

स्त्रोत:
१. नेहरू एन्ड बोस: पैरलल लाइव्स (पुस्तक)
२. आउटलुक, नवभारत टाइम्स, पत्रिका व अन्य समाचार पत्र
३. विकिपीडिया, गूगल और अन्य ऑनलाइन स्रोत

4 thoughts on “नेताजी और कांग्रेस”

  1. उस सूर्य को उस समय के राहू और केतु ने ग्रस लिया था। उनके तेज को दबा दिया, अन्यथा आज भारत उस सूर्य के प्रखर तेज से दैदीप्यमान होता, तो आज की विश्व शक्तियाँ न सर उठाती और न देश का विभाजन होता।

  2. उस सूर्य को उस समय के राहू और केतु ने ग्रस लिया था। उनके तेज को दबा दिया, अन्यथा आज भारत उस सूर्य के प्रखर तेज से दैदीप्यमान होता। यदि ऐसा होता तो आज की विश्व शक्तियाँ न सर उठाती और न देश का विभाजन होता।

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