काश्मीर की कहानी (भाग-2)

(पहला भाग यहाँ पढ़ें)

आजादी के बाद लगभग 565 रियासतों का भारत में पूर्ण विलय हो गया। लेकिन काश्मीर को लेकर आज तक विवाद क्यों चल रहा है? पढ़िए कश्मीर की पूरी कहानी मेरे ब्लॉग पर। पिछले भाग में मैंने बताया था कि सन 1846 में अमृतसर की संधि हुई और अंग्रेजों ने जम्मू के राजा गुलाब सिंह को ही वहाँ के शासक के रूप में मान्यता दे दी, जो कि सिख-साम्राज्य के काल में भी उस रियासत के प्रशासक थे। जम्मू के अलावा अब अंग्रेजों ने लद्दाख और काश्मीर के इलाके भी 75 लाख रूपये में राजा गुलाब सिंह को बेच दिए और इस तरह वर्तमान जम्मू-काश्मीर राज्य की सीमाएं बनीं।

सन 1848 में पुनः एक बार अंग्रेजों और सिखों का युद्ध हुआ, लेकिन गुलाब सिंह ने अंग्रेजों से हुई संधि के अनुसार सिखों के खिलाफ अंग्रेजों की सहायता की और फिर एक बार सिखों की हार हुई। इसके बाद सिख साम्राज्य पूरी तरह समाप्त हो गया और पंजाब अंग्रेजों के कब्जे में आ गया।

सन 1856 में महाराजा गुलाब सिंह की बीमारी के कारण उनके पुत्र रणबीर सिंह को महाराजा बनाया गया। अगले 28 वर्षों तक काश्मीर उन्हीं के अधीन रहा। उनके बाद महाराजा प्रताप सिंह और अंत में सन 1925 से 1947 तक जम्मू-काश्मीर रियासत में महाराजा हरि सिंह का शासन रहा।

19 वीं शताब्दी में ब्रिटेन की काश्मीर नीति मुख्यतः रूस और ब्रिटेन के बीच जारी खींचतान से तय हो रही थी। ब्रिटेन को लगातार यह डर सताता रहता था कि रूस धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए अंततः भारत पर कब्जा करना चाहता है। इसलिए ब्रिटेन ने अफगानिस्तान और काश्मीर को अपनी ढाल बनाकर रखना चाहता था।

1939 में द्वितीय विश्व-युद्ध छिड़ गया। ब्रिटिश सरकार ने भारत में भी आपातकाल घोषित कर दिया और भारत के संसाधनों व सैनिकों को विश्व-युद्ध में ब्रिटेन की ओर से लड़ने के लिए लगा दिया गया। काँग्रेस ने आपत्ति जताई कि भारत को युद्ध में धकेलना ब्रिटिश सरकार का एकपक्षीय निर्णय था और इसमें भारत के लोगों से राय नहीं ली गई थी। इसके विरोध में काँग्रेस ने प्रांतीय सरकारों से इस्तीफा दे दिया। काँग्रेस के हटने से इन प्रांतों की राजनीति में जो जगह खाली हुई थी, उससे मुस्लिम लीग को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिला और उसने युद्ध में ब्रिटिश सरकार को पूरी सहायता देने की घोषणा कर दी।

विश्व युद्ध के दौरान काँग्रेस के विरोध को देखकर ब्रिटिश सरकार को यह चिंता हुई कि भारत की स्वतंत्रता के बाद यदि पूरे ब्रिटिश भारत (आज का भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) पर काँग्रेस का शासन हो गया, तो इस पूरे क्षेत्र से ब्रिटेन का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और भविष्य में भारत से कभी सैन्य सहायता भी नहीं मिल सकेगी।

यह ब्रिटेन के लिए चिंताजनक था क्योंकि मध्य पूर्व में तेल के बड़े भंडार थे और उन पर नियंत्रण बनाए रखने व रूस को आगे बढ़ने से रोकने के लिए भारत की पश्चिमी सीमा पर ब्रिटिश सेना की मौजूदगी आवश्यक थी। इसलिए यह ज़रूरी था कि भारत के पश्चिमी इलाके में ऐसी सरकार हो, जो स्वतंत्रता के बाद भी ब्रिटेन की सहायता जारी रखे और विरोध न करे। काँग्रेस की सरकार बनने पर ऐसा संभव नहीं होने वाला था। इसलिए काँग्रेस की विरोधी मुस्लिम लीग को आगे बढ़ाने में ही अंग्रेजों को अपना फायदा दिखाई दिया। जिन्ना को भी यह बात अच्छी तरह समझ आ गई थी कि अंग्रेज सरकार को भी मुस्लिम लीग की ज़रूरत है। इसलिए उन्होंने भी अब पाकिस्तान की माँग और तेज कर दी।

अंग्रेजों को इसमें कई फायदे दिखाई दिए। एक तो यह कि काँग्रेस के विरोध में मुस्लिम लीग को खड़ा करने से काँग्रेस कमजोर हो रही थी और आजादी का आन्दोलन धीमा पड़ रहा था, दूसरा यह कि ब्रिटिश भारत अगर कई टुकड़ों में बिखर जाए, तो उसके अलग-अलग हिस्से आपस में लड़ते रहेंगे और उनकी मदद के बहाने ब्रिटेन का दखल आगे भी यहाँ बना रहेगा, और तीसरा फायदा यह कि यदि इस्लाम के नाम पर एक नया देश बन जाए, तो भविष्य में मध्य पूर्व के इलाके में रूसी सेना के खिलाफ लड़ने में ब्रिटेन की मदद के लिए पाकिस्तान को राजी करना हमेशा आसान रहेगा। पाकिस्तान बनने का मतलब यह भी था कि पश्चिम में कराची का बंदरगाह और पूर्व में चट्टग्राम का बंदरगाह भी ब्रिटिश नौसेना के लिए उपलब्ध रहेगा।

यह भी एक कारण था कि आगे जब हैदराबाद की रियासत ने भारत में मिलने से इनकार किया और स्वतंत्र देश बनकर रहने की बात कही, तब भी ब्रिटेन ने उसका समर्थन किया था क्योंकि अंग्रेजों को आशा थी कि इससे उन्हें पूर्वी भारत में भी एक सैन्य बेस बनाने का मौका मिल जाएगा। इसी कारण माउंटबैटन ने नेहरूजी को सलाह दी थी कि वहाँ सेना न भेजी जाए। लेकिन सरदार पटेल ने यह बात नहीं मानी और सेना भेजकर हैदराबाद को भारत में शामिल करवा लिया।

सन 1946 में ब्रिटेन की केबिनेट मिशन योजना में यह सुझाव दिया गया था कि स्वतंत्रता के बाद भारत का शासन चलाने के लिए संविधान तैयार किया जाए और इसके लिए संविधान सभा बनाई जाए। इसी के अनुसार मतदान के द्वारा संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन हुआ। स्वतंत्रता के बाद यही संविधान सभा भारत की संसद बनी।

संविधान सभा में कुल 389 सदस्य चुने गए थे, जिनमें से 208 सीटें काँग्रेस ने और 73 मुस्लिम लीग ने जीती थीं। 93 सीटें रियासतों के प्रतिनिधियों के लिए आरक्षित थीं। जम्मू-काश्मीर रियासत के चार प्रतिनिधि भी संविधान सभा में शामिल थे।

लेकिन चुनाव के परिणाम से मुस्लिम लीग को भारी निराशा हुई और उसने काँग्रेस के साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया। जुलाई में जिन्ना ने घोषणा कर दी कि मुस्लिम लीग को अब बातचीत का रास्ता छोड़कर ‘सीधी कार्रवाई’ करनी चाहिए और इसी के अनुसार लीग ने 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ मनाया और देश के कई इलाकों में दंगे और भीषण हिंसा हुई।

काँग्रेस अभी भी विभाजन के लिए तैयार नहीं थी। ब्रिटिश सरकार बार-बार गाँधी-नेहरू को यह कहकर चेतावनी देती रही कि यदि पाकिस्तान को बनाने की सहमति नहीं दी गई, तो भारत में गृह-युद्ध छिड़ जाएगा और स्वतंत्रता के बाद सरकार चलाना काँग्रेस के लिए असंभव हो जाएगा। सितंबर 1946 से ही अंग्रेजों ने काँग्रेस पर अंतरिम सरकार में शामिल होने का दबाव बढ़ाना भी शुरू कर दिया। अंततः काँग्रेस झुक गई और अंतरिम सरकार में शामिल हो गई। नेहरू जी को इस सरकार का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। तब जिन्ना ने यह टिप्पणी की थी कि ‘किसी गधे को हाथी कह देने से वह हाथी नहीं बन जाता’

नेहरू जी को प्रधानमंत्री बनाने के तुरंत बाद अंग्रेजों ने उन पर यह दबाव बनाना शुरू किया कि वे मुस्लिम लीग को भी सरकार में शामिल होने के लिए मनाएं। दरअसल ब्रिटिश सरकार यह दिखाना चाहती थी कि पाकिस्तान बनाने का फैसला भारत की अंतरिम सरकार में काँग्रेस और मुस्लिम लीग का आपसी फैसला है और भारत विभाजन के लिए ब्रिटेन जिम्मेदार नहीं है।

नेहरू जी फिर एक बार ब्रिटिश दबाव में झुक गए और अंततः अक्टूबर 1946 में मुस्लिम लीग भी सरकार में शामिल हो गई। अब लीग को भीतर से भी सरकार के कामकाज को नुकसान पहुँचाने की सुविधा मिल गई थी।

संविधान सभा की पहली बैठक दिसंबर 1946 में हुई थी। जून 1947 में माउंटबैटन ने भारत-विभाजन की योजना प्रस्तुत की और यह घोषणा कर दी कि 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज भारत छोड़कर चले जाएंगे। जुलाई 1947 में ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया। इसकी धारा 8 (2) के अंतर्गत यह घोषित किया गया कि 1935 के भारत सरकार अधिनियम में आवश्यक संशोधन किए जाएंगे और 15 अगस्त 1947 से यही भारत का अंतरिम संविधान होगा। जब तक संविधान सभा भारत का नया संविधान तैयार नहीं कर लेती, तब तक इसी अंतरिम संविधान के अनुसार भारत सरकार अपना कामकाज चलाएगी। माउंटबैटन योजना के अनुसार ही 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के लिए एक अलग संविधान सभा का गठन किया गया और मुस्लिम लीग के जो सदस्य भारत की संविधान सभा में थे, वे अब पाकिस्तान की संविधान सभा में चले गए।

जून में माउंटबैटन योजना की घोषणा के साथ ही यह भी तय हो चुका था कि भारत-विभाजन होने के बाद ब्रिटिश भारत के कौन-से क्षेत्र नए भारत में रहेंगे और कौन-से पाकिस्तान में जाएंगे। रियासतों को यह छूट थी कि वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में शामिल हो जाएं या फिर स्वतंत्र देश बनकर रहें।

इसी के अनुसार ब्रिटिश सरकार के रियासती विभाग ने एक ‘अधिमिलन-पत्र’ (Instrument of Accession) तैयार किया था। जो भी रियासत भारत या पाकिस्तान में शामिल होना चाहे, उसके शासक को इस अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करके उसे गवर्नर जनरल के पास भेजना पड़ता था और गवर्नर जनरल के हस्ताक्षर हो जाने पर वह लागू हो जाता था। यह प्रक्रिया भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 6 के द्वारा बताई गई थी। उससे यह भी स्पष्ट था कि एक बार विलय हो जाने पर भविष्य में कभी भी उसे बदला नहीं जा सकेगा और न चुनौती दी जा सकेगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि एक बार विलय हो जाने पर यह हमेशा के लिए लागू हो जाएगा और भविष्य में उसे किसी भी प्रकार से बदला नहीं जा सकेगा।

विलय का निर्णय लेने का अधिकार केवल रियासत के शासक को ही था और इसके लिए जनता की राय लेना या मतदान करवाना आवश्यक नहीं था। वैसे भी रियासतों में लोकतंत्र नहीं था, इसलिए जनता की राय जानने या मतदान करवाने की बात लागू भी नहीं हो सकती थी।

भारत का भावी संविधान भी इन रियासतों पर अपने आप लागू नहीं होने वाला था। रियासतों का अपना अलग संविधान हो सकता था और  इसके लिए भारत की संविधान सभा के समान ही इन रियासतों की भी अपनी-अपनी संविधान सभा का गठन होना था, जो कि अपनी-अपनी रियासतों का संविधान तैयार करने वाली थीं। इसी के अनुसार जम्मू-काश्मीर रियासत में भी संविधान सभा का गठन किया गया था, जिसमें 75 सदस्य थे।

लगभग सभी रियासतों में यही प्रक्रिया अपनाई गई थी और अगस्त 1947 तक अधिकांश रियासतों ने भारत में शामिल होने के लिए अधिमिलन-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम में यह स्पष्ट कहा गया था कि किसी भी रियासत को भारत या पाकिस्तान में शामिल करने का निर्णय केवल वहाँ का शासक ही कर सकता है और इसमें वहाँ की जनता से राय लेना या मतदान करवाना आवश्यक नहीं होगा। लेकिन फिर भी नेहरू जी की यह जिद थी कि किसी भी रियासत का भारत में विलय करने से पहले वहाँ मतदान करवाया जाए और लोगों की राय ली जाए, उसके बाद ही भारत सरकार इस विलय को माने। ऐसा इसलिए क्योंकि शेष भारत के लोगों को मतदान का अधिकार था और काँग्रेस चाहती थी कि रियासतों की प्रजा को भी वही अधिकार मिले।

काश्मीर के मामले में आज भी पाकिस्तान अक्सर यह तर्क देता है कि वहाँ जनमत संग्रह करवाकर लोगों की राय ली जानी चाहिए। लेकिन यह याद दिलाना जरूरी है कि आजादी के तुरंत बाद जब हैदराबाद रियासत को लेकर विवाद चल रहा था, तब भारत ने यह प्रस्ताव दिया था कि वहाँ जनमत-संग्रह करवाकर लोगों की राय ले ली जाए और यदि वे पाकिस्तान में शामिल होना चाहें, तो भारत इसे मान लेगा। तब जिन्ना ने इस प्रस्ताव को तुरंत ही नकार दिया था और यह बात साफ कह दी थी कि इसका फैसला केवल रियासत का शासक ही ले सकता है, और उसकी मंजूरी केवल गवर्नर जनरल ही दे सकता है। इसमें जनता की कोई भूमिका नहीं हो सकती।

यह बात बहुत अजीब लगती है कि आजादी के बाद भी नेहरू जी ने गवर्नर जनरल के पद पर किसी भारतीय नेता को नियुक्त करने की बजाय माउंटबैटन से ही आग्रह किया कि वे ही भारत के गवर्नर जनरल बने रहें। माउंटबैटन ने भी तुरंत ही यह बात मान ली। इस कारण भारत की आजादी के बाद भी गवर्नर जनरल के नाते माउंटबैटन को भारत सरकार की बैठकों में शामिल होने और भारत के आंतरिक मामलों में लगातार दखल देते रहने का पूरा अधिकार मिल गया। इसके विपरीत जिन्ना ने समझदारी दिखाते हुए खुद को पाकिस्तान का गवर्नर जनरल घोषित किया और इस तरह अगस्त 1947 में ही माउंटबैटन के दखल से पाकिस्तान को पूरी तरह मुक्त कर लिया।

भारत की आजादी के पहले से ही यह बात स्पष्ट थी कि ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि काश्मीर पाकिस्तान में शामिल हो जाए, भारत में नहीं। जून 1947 में भारत विभाजन की अपनी योजना घोषित करने के बाद खुद माउंटबैटन ने श्रीनगर जाकर महाराजा हरि सिंह को इस बात के लिए राजी करने की कोशिश की थी कि वे अपनी रियासत को पाकिस्तान में मिला दें। लेकिन हरि सिंह ने यह बात नहीं मानी।

दूसरी तरफ सरदार पटेल भी जून 1947 से ही लगातार पत्र लिखकर महाराजा को मनाने का प्रयास कर रहे थे कि वे भारत में शामिल हो जाएं। लेकिन महाराजा इसके लिए भी राजी नहीं थे। वे मुस्लिम-बहुल पाकिस्तान या लोकतांत्रिक भारत दोनों में ही शामिल नहीं होना चाहते थे, बल्कि उनकी आकांक्षा थी कि जम्मू-काश्मीर स्वतंत्र देश बन जाए और वे उसके एकमात्र शासक बने रहें। रियासत के प्रधानमंत्री रामचन्द्र काक भी महाराजा को इसी बात के लिए उकसा रहे थे कि वे रियासत को भारत में शामिल न करें। उनकी पत्नी ब्रिटिश थी और ऐसा माना जाता है कि वे काश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की अंग्रेजों की योजना में शामिल थे।

इसी आशा से महाराजा हरि सिंह ने 12 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान की सरकारों को यह संदेश भिजवाया कि वे जम्मू-काश्मीर रियासत को स्वतंत्र रखना चाहते हैं और भारत या पाकिस्तान में विलय करने के बजाय इन दोनों देशों के साथ यह समझौता करना चाहते हैं कि जम्मू-काश्मीर में यथास्थिति बनी रही। इसका अर्थ यह है कि जम्मू-काश्मीर की रियासत इन दोनों देशों से स्वतंत्र रहेगी।

पाकिस्तान ने 15 अगस्त को यह प्रस्ताव स्वीकार तो कर लिया, लेकिन 24 अगस्त से ही यह धमकी भेजनी भी शुरू कर दी कि महाराजा हरि सिंह को पाकिस्तान में शामिल हो जाना चाहिए अन्यथा रियासत में युद्ध छिड़ जाएगा और उसके परिणाम की कोई जिम्मेदारी पाकिस्तान की नहीं होगी। जिन्ना ने स्वयं अपने निजी सचिव को महाराजा से बात करने के लिए भेजा था और जिन्ना स्वयं भी बीमारी के बहाने श्रीनगर में कुछ दिन आराम करने के लिए आना चाहते थे, ताकि महाराजा पर दबाव बढ़ाने का प्रयास किया जा सके।

अब महाराजा हरि सिंह को आशंका हुई कि शायद पाकिस्तान काश्मीर पर आक्रमण की योजना बना रहा है। सितंबर में ही महाराजा ने भारत सरकार को यह संकेत देना शुरू कर दिया था कि वे भारत में शामिल होने के लिए अधिमिलन-पत्र पर हस्ताक्षर करना चाहते हैं। उन्होंने अपने पाकिस्तान समर्थक प्रधानमंत्री रामचन्द्र काक को पद से हटा दिया और उनकी जगह जनक सिंह को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। लेकिन दो माह बाद ही उन्हें भी हटा दिया गया और अक्टूबर में मेहर चंद महाजन जम्मू-काश्मीर रियासत के प्रधानमंत्री बनाए गए। काश्मीर को भारत में मिलाने में उनकी भी बड़ी भूमिका थी।

इधर भारत के गवर्नर जनरल माउंटबैटन तब भी यही प्रयास करते रहे कि काश्मीर भारत की बजाय पाकिस्तान में ही शामिल हो। नेहरू जी भी काश्मीर के भारत में विलय के प्रस्ताव को मानने को राजी नहीं थे। उन्होंने यह माँग रखी कि महाराजा हरि सिंह पहले अपना पद छोड़ें और शेख अब्दुल्ला को जेल से रिहा करके रियासत के सभी अधिकार अब्दुल्ला को सौंप दें। हरि सिंह यह शर्त मानने को तैयार नहीं हुए।

इसके बाद क्या हुआ और ये शेख अब्दुल्ला कौन थे, इस बारे में मैं अगले भाग में लिखूँगा।

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