कृषि कानून का विवाद

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ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के बाद जब वहाँ बड़ी संख्या में कारखानों का निर्माण होने लगा और तेजी से औद्योगिक उत्पादन की शुरुआत हुई, तो उन फैक्ट्रियों को चलाने के लिए सबसे आवश्यक बात यह थी कि उन्हें कच्चा माल लगातार मिलता रहे, उसमें कोई बाधा न आए।

ब्रिटिश राज में भारत अंग्रेजों के लिए कच्चे माल को हासिल करने का सबसे बड़ा स्रोत था। उस समय उनकी नीति यह थी कि ब्रिटेन की फैक्ट्रियों को जिस कच्चे माल की आवश्यकता हो, अंग्रेज भारत के किसानों से जबरन उसी की खेती करवाते थे और फिर बहुत कम कीमत पर किसान को वह फसल अंग्रेजी हुकूमत को बेचनी पड़ती थी। जैसे इंग्लैंड में मैनचेस्टर की कपड़ा मिलों के लिए कपास की ज़रूरत पड़ती थी, इसलिए आज जो मप्र, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश आदि का इलाका है, वहाँ के किसानों से कपास की खेती करवाई जाती थी।

लेकिन किसान अगर वह फसल उगाने से मना कर दे या अपनी फसल सरकार को न बेचे तो ब्रिटिश सरकार को इंग्लैंड की फैक्ट्रियों के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल कैसे मिलेगा? इसलिए यह पक्का करना जरूरी था कि किसान को वह माल सरकारी एजेंटों को ही बेचना पड़ेगा। इसके लिए अंग्रेजों ने 1886 में हैदराबाद रेसीडेंसी ऑर्डर और फिर 1887 में बरार कॉटन एंड ग्रेन मार्केट एक्ट जैसे कानून बनाए। इन कानूनों के अंतर्गत जिले का अंग्रेज कलेक्टर कोई स्थान निर्धारित कर देता था और फिर किसानों को अपना माल उसी स्थान पर और सरकार द्वारा नियुक्त एजेंटों को ही बेचना पड़ता था।

जैसे अपनी फसल निश्चित स्थान पर और निश्चित कीमत पर ही बेचने के लिए किसानों को मजबूर किया गया, वैसे ही उन्हें इस बात के लिए भी मजबूर किया गया कि वे सरकार द्वारा निर्धारित फसल ही उगाएं। जैसे बिहार के किसानों को जबरन नील की खेती करने पर मजबूर किया जाता था। सन 1900 के दशक तक अमरीका में चीन से आने वाले नील को प्रतिबंधित कर दिया गया। इसलिए नील का उत्पादन बढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने भारत के किसानों को मजबूर करना शुरू किया। नील की खेती में पानी बहुत लगता था और इससे जमीन भी बंजर होती जाती थी, इसलिए भारत के किसान नील की बजाय धान और दलहन आदि की खेती करना ही पसंद करते थे। उन पर दबाव डालने के लिए अंग्रेजों ने स्थानीय नवाबों, जमींदारों आदि के माध्यम से ऐसी स्थिति बना दी कि जब तक किसान नील की खेती के लिए राजी न हो जाए, तब तक उन्हें कृषि कार्य के लिए कोई कर्ज या किसी भी प्रकार की सहायता न मिल सके। आपने स्कूल में इतिहास की पुस्तकों में पढ़ा होगा कि गांधीजी ने 1917 में चंपारण में सत्याग्रह किया था। वह सत्याग्रह इसी नील की जबरन खेती के विरोध में था।

1947 में अंग्रेज चले गए, और उनकी बनाई हुई कुछ नीतियाँ भी उनके साथ चली गईं। आजादी के बाद किसान किसी विशेष फसल की खेती करने के लिए मजबूर नहीं थे और अपनी इच्छा से जो चाहे उगा सकते थे। लेकिन उनसे अनाज खरीदने वाले व्यापारी यदि जमाखोरी करके कीमत बढ़ाने लगें, तो क्या होगा?

इसको रोकने के लिए 1955 में सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम नाम का एक कानून बनाया। इसके द्वारा सरकार को अधिकार मिल गया कि वह अनाज, दवाओं आदि को ‘आवश्यक वस्तु’ घोषित कर सकती है और उसका अधिकतम मूल्य भी तय कर सकती है, ताकि कोई भी उस वस्तु की जमाखोरी न कर सके और न ही मनमानी कीमत पर उसे बेचे। इससे बाजार में ज़रूरी सामान की कीमत नियंत्रित रखने में मदद मिली। कौन-सी वस्तु को आवश्यक वस्तु माना जाएगा, यह सरकार विशेष परिस्थितियों को देखकर तय करती है। जैसे इस वर्ष भी आपने सुना होगा कि कोरोना वायरस का प्रकोप फैलने के कारण सरकार ने मास्क या सैनिटाइज़र जैसी वस्तुओं को आवश्यक घोषित किया था, ताकि उसकी जमाखोरी और कीमतों को नियंत्रण में रखा जा सके।

1955 में आवश्यक वस्तु अधिनियम तो आ गया, लेकिन उस समय भारत में कृषि उत्पादन फिर भी पर्याप्त नहीं था। हर साल हमें विदेशों से अनाज मंगवाना पड़ता था। खेती के महत्व को बढ़ाने के लिए जय जवान- जय किसान जैसे नारे उसी समय आए थे। आपने शायद यह भी पढ़ा होगा कि एक बार प्रधानमंत्री शास्त्री जी ने अपील की थी कि अनाज बचाने के लिए लोग एक समय का उपवास रखा करें।

अनाज की इस भारी कमी से निपटने और आत्मनिर्भर बनने के लिए सन 1965-66 के वर्षों में हरित क्रांति की शुरुआत हुई और उस समय की नई तकनीकों की मदद से गेहूं का उत्पादन तेजी से बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया। पंजाब हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इसमें अग्रणी थे।

हरित क्रांति के कारण कृषि उत्पादन बढ़ाने की तकनीकें तो आ गईं, लेकिन एक समस्या यह थी कि किसान ऐसी फसलें नहीं उगाना चाहते थे, जिनमें बहुत मेहनत और समय लगता हो क्योंकि अगर उस फसल को किसी ने खरीदा नहीं तो किसान का क्या होगा? किसान इस बात की गारंटी चाहते थे कि उन्हें फसल की सही कीमत मिलेगी। इसके लिए सरकार ने किसानों को भरोसा दिया कि वह उनका अनाज एक निश्चित मूल्य पर खरीदेगी। यह न्यूनतम समर्थन मूल्य (अंग्रेजी में MSP) कहलाया। इसका अर्थ यह है कि किसान को उसकी फसल के लिए कम से कम उतनी कीमत अवश्य मिलेगी।

लेकिन यह कीमत कैसे तय होगी? इसे तय करने के लिए 1965 में एक कृषि मूल्य आयोग बनाया गया। 1985 में इसका नाम बदलकर कृषि लागत और मूल्य आयोग हो गया। धीरे-धीरे इसकी सूची में और वस्तुएं जुड़ती गईं और अब 23 ऐसे अनाज, दलहन आदि हैं, जिनका समर्थन मूल्य यह आयोग तय करता है। साल में दो बार, खरीफ और रबी की फसल के पहले यह आयोग अपने सुझाव सरकार को भेजता है कि इन 23 वस्तुओं का समर्थन मूल्य क्या होना चाहिए।

सरकार ने 1965 में यह आयोग बनाया, लेकिन यह किसी कानून के दायरे में नहीं आता है। यह केवल कृषि मंत्रालय का एक विभाग मात्र है। इसलिए आयोग की राय मानना सरकार के लिए कानूनन ज़रूरी नहीं है। आयोग केवल अपने सुझाव भेज सकता है, उसे मानना या न मानना सरकार की मर्जी है। यह व्यवस्था इंदिरा जी ने बनाई थी, उसमें मोदी सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया है।

समर्थन मूल्य की व्यवस्था भी बन गई, लेकिन किसानों के सामने एक बड़ी समस्या और भी थी। बड़ी मात्रा में अनाज उपजाने के बाद उसका भंडारण करना हमेशा से ही एक बड़ी दिक्कत रही है। अधिकतर छोटे किसानों के पास इतनी सुविधा नहीं होती है कि वे लंबे समय तक अपने अनाज को संभालकर रख सकें। जल्दी से जल्दी अपनी फसल बेचना उनकी मजबूरी होती है। इसका फायदा उठाकर व्यापारी और दलाल उन पर दबाव डालकर कम से कम कीमत में अनाज खरीदते थे।

इससे निपटने के लिए मंडी कानून बना। उसके अंतर्गत राज्य सरकारों ने कृषि उपज मंडियाँ बनाई हैं और अनाज खरीदने और जमा करने की व्यवस्था की है। आपने भारतीय खाद्य निगम (अंग्रेजी में FCI) के गोदाम देखे होंगे, जहां सरकारी अनाज का भंडारण किया जाता है और फिर राशन की दुकानों आदि से इसे बेचा जाता है।

मंडी कानून के द्वारा सरकारों ने यह कानून बनाया कि व्यापारी सीधे किसानों से फसल नहीं खरीद सकते। इसके बजाय सारी खरीद-बिक्री इन कृषि मंडियों के माध्यम से ही होगी। इसके लिए लोगों को लाइसेंस जारी किये जाते हैं और जिसके पास लाइसेंस है, वही अनाज खरीद सकता है। किसान अपना अनाज सीधे उनमें से किसी को भी बेच सकता है, अन्यथा मंडी में बोली लगाकर माल बेचा जा सकता है। फिर छोटे व्यापारी बाजार में बेचने के लिए इन्हीं मंडियों से अनाज खरीदते हैं।

ये मंडियाँ राज्य सरकारों ने बनाई हैं, इसलिए इनमें अनाज खरीदने-बेचने पर सरकारें टैक्स और अन्य शुल्क भी लेती हैं। यह राज्य सरकारों के लिए कमाई का बड़ा जरिया है।

मंडियों के कारण किसानों की यह मजबूरी होती है कि वे अनाज यहीं बेच सकते हैं। अक्सर व्यापारी और दलाल आपस में सांठगांठ करके कीमत कम रखते हैं और फिर बाद में ऊंची कीमत पर बेचते हैं। कुछ राज्य सरकारों ने इसमें थोड़ी-बहुत छूट दी है, लेकिन अधिकतर राज्यों में किसानों की मजबूरी है कि वे अपना अनाज मंडी के अलावा कहीं नहीं बेच सकते और उन्हें अक्सर समर्थन मूल्य पर ही अनाज बेचना पड़ता है। इसके बाद टैक्स, कमीशन आदि भी चुकाना पड़ता है, इसलिए उनका समर्थन मूल्य उनकी वास्तविक आमदनी नहीं है।

इन दिनों मोदी सरकार के जिन तीन कानूनों का विरोध हो रहा है, वे इसी व्यवस्था में सुधार के लिए बने हैं।

इनमें सबसे पहला है “कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020”। इसके द्वारा किसानों को यह अधिकार दिया गया है कि वे पूरे देश में कहीं भी अपनी फसल अपनी मर्जी से बेच सकते हैं। अपने ही इलाके की सरकारी कृषि उपज मंडी में ही अपनी फसल बेचना अब ज़रूरी नहीं है। लेकिन मंडी की व्यवस्था खत्म नहीं की गई है, इसलिए जो किसान वहीं फसल बेचना चाहता है, वह अभी भी वहाँ बेच सकता है। इस नए कानून के द्वारा यह भी तय कर दिया गया है कि राज्य सरकारें मनमाने ढंग से किसी भी तरह का टैक्स या शुल्क नहीं बढ़ा सकतीं।

दूसरा कानून “कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020” है। इसके द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि किसान चाहे तो निजी कंपनियों या खरीदारों के साथ सीधे करार भी कर सकता है और उस करार के अनुसार फसल उगाकर पहले से तय कीमत पर बेच सकता है। इसके कारण विवाद की स्थिति होने पर किसानों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और विवाद के निपटारे की व्यवस्था भी इसमें दी गई है।

इन दो कानूनों से किसानों की सुविधा और सुरक्षा तो तय हो गई, लेकिन अगर किसान से माल खरीदने वाला व्यापारी या कंपनी बाद में अगर मनमानी कीमत में बाजार में बेचने लगे, तो क्या होगा? मान लीजिए कल देश का सारा गेहूं मोदी के दोस्त अंबानी की रिलायंस कंपनी खरीद ले और जमाखोरी करके बहुत महंगी कीमत पर बेचने लगे तो आम आदमी का क्या होगा?

इसके उलट अगर सरकार हर बात में दखल देने लगे और मनमाने ढंग से कीमतें तय करने लगे तो व्यापारियों का क्या होगा? किसी व्यापारी ने किसान को ऊंची कीमत देकर फसल खरीदी है और फिर सरकार उसे जबरन कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर करे तो क्या होगा?

इसलिए आम ग्राहक का ध्यान रखते हुए और सरकार की ऐसी किसी भी मनमानी को रोकने के लिए एक तीसरा कानून बनाया गया है, जिसके द्वारा 1955 के आवश्यक वस्तु अधिनियम में थोड़ा बदलाव किया गया है। अब नए कानून के अंतर्गत केवल युद्ध, अकाल, प्राकृतिक आपदा या वस्तुओं की कीमत में अत्यधिक वृद्धि होने पर ही सरकार किसी वस्तु को आवश्यक वस्तु घोषित कर सकेगी। यदि किसी अनाज का मूल्य पिछले पाँच वर्षों के औसत मूल्य की तुलना में अचानक डेढ़ गुना या उससे अधिक बढ़ जाए, तो उसे अप्रत्याशित मूल्य वृद्धि माना जाएगा और यदि फलों अथवा सब्जियों की कीमत अचानक दोगुनी बढ़ जाए, तो उसे अप्रत्याशित वृद्धि माना जाएगा और केवल ऐसी स्थिति में ही सरकार आम आदमी की राहत के लिए उसे आवश्यक वस्तु घोषित करेगी।

किसान यदि सरकारी मंडी के अलावा कहीं भी अनाज बेचने लगेंगे, तो राज्य सरकारों को मंडियों से जो टैक्स मिलता है उसका क्या होगा? किसान अगर अपना अनाज सीधे ही किसी को भी बेचने लगेंगे, तो आज इस खरीद पर जिन व्यापारियों और एजेंटों का कब्जा है, वे अपनी मनमानी कैसे चलाएंगे?

किसानों की रक्षा के नाम पर हो रहा पूरा विरोध इसी बात का है। समर्थन मूल्य और अन्य बातें केवल बहाना हैं। समर्थन मूल्य पहले भी किसी कानूनी दायरे में नहीं था और न अब उसे हटाया गया है। किसान अपनी इच्छा से अभी भी मंडी में फसल बेचने को आजाद है और वहाँ उसे आज भी समर्थन मूल्य मिलेगा। इसमें गलत क्या है?

मुझे विभिन्न स्रोतों को पढ़कर जो भी जानकारी मिली, वह मैंने आप तक पहुँचा दी है। इसमें जो बातें गलत हों, आप मुझे तथ्यों के साथ बताएं, तो मैं सुधार कर दूंगा। बाकी आप अपनी राय पर अड़े रहने और अपनी इच्छा से मोदी सरकार का समर्थन या विरोध सब करने के लिए स्वतंत्र हैं। आपकी राय बदलवाने में मेरी कोई रुचि नहीं है। सादर!

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