भारतीय गणतंत्र के ‘अनिवासी’

भारत के श्यामजी कृष्ण वर्मा पढ़ाई के लिए ऑक्सफर्ड गए और कुछ वर्षों बाद लंदन ही उनका घर बन गया। वहाँ रहकर भी उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए लगातार काम किया। पढ़ाई के लिए ऑक्सफर्ड आने वाले भारतीय छात्रों के लिए स्कॉलरशिप शुरू की। 1905 में इंडियन होम रूल लीग की स्थापना की। भारत से आने वाले छात्रों के लिए लंदन में इण्डिया हाउस शुरू करवाया, जहाँ लाला हरदयाल, वीर सावरकर, मदनलाल ढींगरा और ऐसे न जाने कितने भारतीय क्रांतिकारियों को आश्रय मिला। फिर ब्रिटिश सरकार से बचने के लिए जब उन्हें पेरिस चले जाना पड़ा, तो वहाँ रहकर भी उन्होंने रूस, फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए मदद की व्यवस्था की।

इसी तरह अमरीका और कनाडा में रहने वाले भारतीयों ने भारत की आजादी के आंदोलन में योगदान करने के लिए गदर पार्टी बनाई।

दादाभाई नौरोजी ने लंदन इंडियन सोसायटी की स्थापना की और बाद में वे ब्रिटेन में चुनाव जीतकर वहाँ की संसद में पहुँचने वाले पहले भारतीय बने। वहाँ संसद में उन्होंने आयरलैंड और भारत की स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठाई।

रासबिहारी बोस ने जापान में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और फिर आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना की।

आजादी के बाद भी जब 1975 में इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई, तो इसके खिलाफ हुए आन्दोलन में ब्रिटेन, अमेरिका, केनिया जैसे कई देशों में बसे भारतीयों से भी बहुत मिली थी।

आज भी विदेशों में रहने वाले भारतवंशी हर साल भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग 80 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा का योगदान करते हैं, जो भारत का जीडीपी का लगभग 3 प्रतिशत है।

इसके अलावा भी विदेशों में रहने वाले लोग कई अन्य तरीकों से भी भारत के लिए योगदान करते हैं। कोई अपने पैतृक गाँव में स्कूल खुलवाता है, कोई किसी सामाजिक संस्था के माध्यम से सहयोग भिजवाता है, कोई प्राकृतिक आपदाओं के समय मदद करता है, कोई भारत की कंपनियों या नए स्टार्ट-अप प्रयासों में निवेश करता है, तो कोई विदेशों से नई तकनीक की जानकारी भारत के लिए उपलब्ध करवाता है। कहने का आशय यह है कि व्यक्ति चाहे तो दुनिया में कहीं भी रहकर भारत के लिए कई तरह से योगदान कर सकता है और अधिकतर लोग अपने-अपने स्तर पर अपनी-अपनी क्षमता से ऐसा करते भी हैं। इसके अलावा विदेशों में रहने वाला हर भारतीय जाने-अनजाने में ही यहाँ के समाज में भारत की छवि बनाने या बदलने में योगदान करता है और एक तरह से वह विदेशों में भारत का सांस्कृतिक व सामाजिक प्रतिनिधि होता है।

दुनिया में किसी भी अन्य देश की तुलना में भारत के नागरिक सबसे अधिक संख्या में दूसरे देशों में बसे हैं। न्यूज़ीलैंड से कनाडा तक दुनिया के हर महत्वपूर्ण देश में बड़ी संख्या में भारतवंशी रहते हैं और कई देशों की राजनीति, उद्योग, कारोबार और अन्य कई क्षेत्रों में उनका बहुत प्रभाव भी है। भारत से बाहर रहने वाले ये करोड़ों लोग और भारत के भीतर रहने वाले सवा अरब लोग मिलकर पूरी दुनिया में भारत के प्रभाव को बढ़ाने में अद्भुत योगदान कर सकते हैं। यह बात बड़ी विचित्र लगती है कि जिस ऊर्जा का उपयोग हमें साथ मिलकर भारत के हित में करना चाहिए, उसका उपयोग भी हम आपस में लड़ने के लिए ही करते हैं। धर्म, जाति, भाषा, राज्य, संस्कृति, परंपरा, रंग जैसे मुद्दों पर लड़ने के बाद अब लोगों ने लड़ने के लिए निवासी और अनिवासी का मुद्दा भी पकड़ लिया है, यह बड़ी दुखद बात है।

आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह सब लिखना इसलिए उचित लगा क्योंकि भारत में रहने वाले कई लोगों के मन में यह गलत धारणा पक्की जमी हुई है कि अगर कोई भारत से बाहर रहता है, तो उसका सीधा मतलब यही है कि वह भारत से घृणा करता है और इसी कारण वह भारत को छोड़कर बाहर चला गया है। इसलिए ऐसे लोगों को लगता है कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों को भारत की किसी भी समस्या या किसी भी मामले के बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है और कुछ भी बोलने से पहले उन्हें विदेशों से सब-कुछ छोड़छाड़ कर भारत लौटना चाहिए और उसके बाद ही भारत के बारे में मुँह खोलना चाहिए।

मुझे नहीं पता कि यह गलत सोच कैसे विकसित हुई है, लेकिन इसे बदलना बहुत आवश्यक है।

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि भारत में रहने वाले सभी लोग निस्वार्थ देशभक्त ही हैं। यदि होते, तो फिर भारत में आज कोई समस्या ही बाकी न बची होती। ठीक उसी तरह यह सोचना भी बिल्कुल गलत है कि भारत से बाहर रहने वालों के मन में भारत के लिए कोई प्रेम या निष्ठा नहीं होती है इसलिए उन्हें भारत के मामले में कुछ बोलने का अधिकार नहीं है। ये दोनों ही बातें गलत हैं। भारत में रहने वालों और भारत से बाहर रहने वालों दोनों को ही यह बात समझनी चाहिए।

जो लोग भारत से बाहर रहते हैं, उन्हें मैं विशेष रूप से कहना चाहता हूँ कि कोई भी अगर यह कहकर आपकी आवाज़ दबाने का प्रयास करे कि आप भारत से बाहर हैं इसलिए भारत के मामले में मत बोलिए, तो आपको ऐसे दबाव से बिल्कुल घबराना नहीं चाहिए। मैं सोशल मीडिया पर बहुत लिखता हूँ और मुझे बहुत बार बहुत लोगों ने बहुत तरह से इसी तर्क के द्वारा चुप कराने का बहुत प्रयास किया है। लेकिन मैं ऐसे किसी दबाव पर और ऐसी बेतुकी बातें कहने वालों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता हूँ। उनसे डरने और दबने का तो कोई सवाल ही नहीं है। आपको भी भारत के हित में अपनी बात कहने से बिल्कुल नहीं झिझकना चाहिए। बेतुकी बकवास करने वाले लोग भारत में भी और भारत के बाहर भी बहुत मिलते हैं। उनकी संतुष्टि के लिए अपना मुँह बंद रखना बेवकूफी होगी। सादर!

आप सबको गणतंत्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं!

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