बेरोजगारी या अयोग्यता?

मेरे करियर की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई थी।

तब मैं कुछ वेबसाइटों के लिए लेख लिखता था। ये लेख बहुत बेसिक होते थे और पैसे भी बहुत कम मिलते थे। इसलिए मैने सोचा कि कुछ और भी किया जाए।

तब मैंने ब्लॉग बनाना नया-नया सीखा था, तो मैंने एक और ब्लॉग शुरू किया और धीरे धीरे वह चल भी गया। कुछ विज्ञापन भी मिलने लगे और थोड़ी बहुत कमाई भी होने लगी।

उसी के साथ-साथ मैंने वेबसाइट बनाना भी सीख लिया था और अपनी स्वयं की वेबसाइट भी लॉन्च कर दी थी। उसे देखने के बाद और एक दो लोगों ने मुझसे संपर्क किया और मैंने उनके लिए भी वेबसाइटें बनाईं।

उन्हीं दिनों मैने एक पुस्तक भी लिखी थी और कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया।

अब अनुवाद के काम में व्यस्तता बढ़ गई थी, इसलिए मुझे अपने ब्लॉग को संभालने और वेबसाइट डिजाइनिंग वाला काम आगे बढ़ाने के लिए लोगों की तलाश थी। मैंने बहुत प्रयास किया, कई बेरोजगारों से संपर्क किया, ऑनलाइन भी कई लोगों से बात की। लेकिन किसी न किसी कारण से बातचीत विफल हो जाती थी।इन सब मामलों में मैंने एक दो कॉमन बातें देखीं। ज्यादातर लोग भले ही बेरोजगार बैठे रहने को तैयार थे, लेकिन कुछ नया सीखने या करने को तैयार नहीं थे। वे केवल सरकारी नौकरी या प्रतियोगी परीक्षाओं के अलावा कुछ और नहीं सोचना चाहते थे, भले ही उनमें कितनी ही बार असफल हो चुके थे।

अंततः मैने वह विचार छोड़ दिया।

मैं अनुवाद के काम में इतना अधिक व्यस्त रहने लगा था कि कुछ और करने की फुर्सत नहीं बचती थी और बाकी कामों को संभालने के लिए कोई सही व्यक्ति मिल भी नहीं पाया था इसलिए ब्लॉगिंग और वेबसाइट वाले काम मैंने बंद ही कर दिए।

अगले 2-3 सालों में अनुवाद का ही काम मेरे पास इतना अधिक आने लगा था कि मुझे लगभग रोज ही दो-चार कंपनियों को मना करना पड़ता था। मैं तो केवल अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद करता था लेकिन कई बार मेरे काम की अच्छी क्वालिटी को देखकर कंपनियां मुझसे अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी पूछताछ करती रहती थी।

तब मेरे मन में एक बार यह विचार आया कि मैं ही कई भाषाओं के अनुवादकों की एक टीम बनाकर अपनी कंपनी शुरू कर दूं। इसमें उनका भी फायदा होगा और मेरा भी। मेरे पास उन दिनों इतना काम रहता था कि 10 लोग भी मिल जाते, तो भी शायद कम पड़ते

फिर एक बार मैने कुछ लोगों से संपर्क किया।

लेकिन मुझे बहुत-से लोगों को रिजेक्ट करना पड़ा क्योंकि उनका काम अच्छी क्वालिटी का नहीं था और वे सीखने को भी तैयार नहीं थे। अगर आपके पास कोई अनुभव भी नहीं है और आप सीखने को भी राजी नहीं हैं, तो आगे कैसे बढ़ेंगे? कुछ लोगों के पास अनुभव था, तो उसके साथ यह गलतफहमी भी थी कि वे जो भी लिख दें, जैसा भी लिख दें वही अनुवाद सही है। ऐसे लोग कितने ही ज्ञानी हों लेकिन किसी भी टीम में काम करने लायक नहीं होते हैं। वे खराब संतरे के समान पूरी टोकरी को खराब कर देते हैं।

धीरे धीरे मैंने वह विचार भी टाल दिया।

मेरा कामकाज तो तब भी पहले जैसा ही चल रहा था इसलिए मुझे तो अपनी कोई चिंता नहीं थी, लेकिन यह देखकर बहुत अजीब लगता था कि केवल अपने अज्ञान या अहंकार के कारण कई सारे लोग कुछ नया सीखने, कुछ नया करने और कुछ अधिक कमाने के कितने सारे अवसर गँवा रहे थे।

फिर 2016 में मैं नौकरी के कारण भारत से बाहर चला गया।

उसी समय से मैंने फ्रीलांस अनुवाद का अपना काम भी पूरी तरह बंद कर दिया। लेकिन उसके बाद भी दो तीन बार ऐसे अवसर आए, जब मुझे पहले जैसे ही अनुभव मिले।

वर्ष 2017 या 2018 में मैंने हिन्दी में एक ऑनलाइन न्यूज़लेटर शुरू करने का विचार किया था। उसका पहला संस्करण तो मैंने स्वयं ही तैयार करके एक नई वेबसाइट बनाकर प्रकाशित भी किया था। लेकिन मैं चाहता था कि उस काम को बहुत आगे बढ़ाया जाए। मेरे मन में उससे जुड़ी की कई योजनाएं थीं। कुछ लोगों ने मुझसे संपर्क भी किया था कि वे इस काम की ज़िम्मेदारी संभालने के इच्छुक हैं। मैंने उनमें से एक-दो लोगों से चर्चा भी की, वे जितना पारिश्रमिक चाहते थे, वह भी देने को मैं सहमत था। उनमें से एक ने कन्फ़र्म भी कर दिया कि वे इस बातचीत से सहमत हैं और जल्दी ही काम शुरू करेंगे।

लेकिन उसके बाद अचानक ही वे बिना बताए हमेशा के लिए गायब हो गए। न कोई काम किया, न मुझसे पैसे लिए, न कोई कारण बताया।

फिर वर्ष 2018 या 2019 में मैंने फिर एक बार अपनी वेबसाइट और ब्लॉग दोबारा शुरू करने का विचार किया। एक सज्जन ने मुझे यह प्रस्ताव भी दिया था कि वे ब्लॉग और वेबसाइट बनाने व संभालने का जिम्मा उठाएंगे। उन्हें उसके लिए जो भी रकम उचित लगती, मैं देने को तैयार भी था। उस समय किसी कारण मुझे वह काम कुछ समय के लिए टालना पड़ा। उन्होंने तब भी सहमति दी थी कि बाद में जब कभी मैं करना चाहूँ, हम उस काम को शुरू कर देंगे।

कुछ माह बाद मैंने फिर से संपर्क किया। हमारी बातचीत फिर तय हो गई। मैंने कई दिनों तक प्रतीक्षा भी की, लेकिन काम फिर भी आगे नहीं बढ़ पाया। मैंने यह सोचा कि वे सज्जन शायद किसी और काम में व्यस्त हो गए होंगे। फिर मैंने एक-दो अन्य लोगों से बात की। उनमें से एक को इस काम का कोई अनुभव नहीं था। मैं इसे सीखने के लिए भी उन्हें वेतन देने को तैयार था, लेकिन उन्होंने इसके लिए भी मना कर दिया। यह बात मुझे आज तक समझ नहीं आई कि मैं पैसे देकर सिखाने को तैयार था और फिर भी सीखने वाले ने मना क्यों कर दिया होगा, जबकि उन्हें स्वयं भी रोजगार की तलाश थी और मैं रोजगार देने को तैयार था।

अंततः मैंने तय किया कि मैं खुद ही यह काम करूँगा। इसलिए अब दोबारा मैंने अपने इस ब्लॉग और अपनी वेबसाइट पर खुद ही काम शुरू किया है। लोगों पर निर्भर रहने में बड़ा जोखिम है, इसलिए अब मैं तकनीक की मदद लेता हूँ। वेबसाइट खुद बनाने के बजाय मैंने बने-बनाए टेम्पलेट खरीद लिए और उनको अपनी पसंद के अनुसार बदल लूँगा। अनुवादकों को ढूंढने की बजाय मैं गूगल से अनुवाद करता हूँ और फिर उसमें सुधार कर लेता हूँ। लेख को ऑडियो में बदलने के लिए मैंने एक अन्य कंपनी को पैसे देकर उनका टूल खरीद लिया और उससे रिकॉर्डिंग कर लेता हूँ। आगे मुझे वीडियो और अन्य कई चीज़ों पर काम करना है, उसमें भी मैं ऐसा ही कुछ करूँगा।

पहले जब भी किसी काम के लिए मदद की आवश्यकता होती थी, तो मैं सही लोगों को ढूंढने का प्रयास करता था, ताकि उन्हें भी रोजगार मिले और मेरा भी काम हो जाए। लेकिन अब मैं लोगों को नहीं ढूंढता। कोई पूछे भी तो मना कर देता हूँ। मैं अब हर काम के लिए टूल्स, ऐप्स और सॉफ्टवेयर ढूंढता हूँ।

बहुत-से लोगों को आज भी इस बात की भनक भी नहीं है कि तकनीक कितनी आगे बढ़ चुकी है। लोग अगर अपने पुराने तरीकों को नहीं बदलेंगे, अपने आलस्य और निष्क्रियता को नहीं छोड़ेंगे, स्वयं को सर्वज्ञ समझने के बजाय यदि अपने ज्ञान और कौशल को लगातार अपडेट नहीं करेंगे, तो जल्दी ही ऐसे लोग पूरी तरह से अनावश्यक हो जाएंगे। ऐसे लोग किसी भी तरह के रोजगार में फिर फिट नहीं होंगे। यह बात वाकई सबको समझनी चाहिए।

पिछले पंद्रह वर्षों के अपने ऐसे ही अनुभवों के आधार पर ही मैं अक्सर कहता हूँ कि भारत की असली समस्या बेरोजगारी (Unemployment) नहीं, बल्कि अयोग्यता (Unemployability) है।

आजकल हर क्षेत्र में कामकाज के इतने अवसर हैं कि बेरोजगारी वाकई में कोई समस्या नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि जो लोग उपलब्ध हैं, वे उस काम को करने के लायक नहीं हैं।

ये ठीक है कि हमारी सरकारों में, हमारे सिस्टम में, हमारी शिक्षा प्रणाली में बहुत कमियां हैं। लेकिन सिर्फ इन्हें दोष देकर लोगों को अपनी कमियों से भागने की कोशिश बंद कर देनी चाहिए। आज भारत के जितने भी लोग देश में या दुनिया में कहीं भी सफल हुए हैं, वे भी उसी शिक्षा प्रणाली से और उसी सिस्टम से पढ़कर निकले थे। इसलिए बात केवल सिस्टम की नहीं है, कौशल की भी है। डिग्री का कागज मिल जाने भर से अधिकतर लोग ये सोचते हैं कि वे रोजगार के लिए उपयुक्त हैं। इस सोच को बदले बिना कोई बदलाव नहीं आने वाला है।

क्या आपके जीवन में भी ऐसे कोई अनुभव आए हैं, जब आप उचित पारिश्रमिक देने को तैयार थे, फिर भी आपको काम करने के लिए सही लोग नहीं मिल पाए? कृपया नीचे कमेन्ट में बताएं। धन्यवाद!

(चित्र गूगल से)

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