‘सॉफ्ट पॉवर’

अमरीका में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोसेफ नेई ने 1990 में अपनी एक पुस्तक में ‘सॉफ्ट पॉवर‘ की अवधारणा प्रस्तुत की थी।सैन्य शक्ति, धन-बल आदि ‘हार्ड पॉवर‘ हैं, जिनका उपयोग विश्व के शक्तिशाली देश अन्य देशों को झुकाने या अपनी बात मनवाने के लिए करते हैं।

लेकिन प्रोफेसर नेई का तर्क है कि इन पारंपरिक तरीकों के अलावा सॉफ्ट पॉवर के माध्यम से भी अन्य देशों को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है और अपने फायदे के लिए दुनिया में अपने देश की अपने अनुकूल छवि बनाई जा सकती है। ऐसी छवि बनाने में उस देश की कंपनियों, प्रसिद्ध व्यापारिक ब्रांड्स, फिल्मों, संगीत, संस्कृति आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जैसे हॉलीवुड, मैक्डॉनल्ड, कोका-कोला आदि अमरीकी सॉफ्ट पॉवर के कुछ उदाहरण हैं। अंग्रेज़ी भाषा और बीबीसी न्यूज़ जैसे चैनल ब्रिटिश सॉफ्ट पॉवर के कुछ उदाहरण हैं। योग और आयुर्वेद जैसी चीज़ें भारत के सॉफ्ट पॉवर हैं। इसी तरह खेल, संस्कृति, त्यौहार, धर्म, पुरस्कार आदि कई तरह के उदाहरण हो सकते हैं।

इनका असर ये होता है कि इनके माध्यम से उस देश की एक निश्चित छवि दुनिया में बनती है और अन्य देशों के लोगों के मन में उस देश के प्रति आकर्षण बढ़ता है। फिर उसका लाभ उठाकर अपनी नीतियां दूसरे देशों पर थोपी जा सकती हैं। सॉफ्ट पॉवर के उपयोग के मामले में अमरीका हमेशा से आगे रहा है। बेशक देश की छवि केवल सॉफ्ट पॉवर के भरोसे नहीं बन सकती और न टिक सकती है, लेकिन इसकी बहुत बड़ी भूमिका अवश्य होती है।

विश्व में अमरीका की छवि गढ़ने में सॉफ्ट पॉवर की भी बड़ी भूमिका है। यही कारण है कि अधिकांश भारतीयों के मन में अमरीका का नाम सुनते ही समृद्धि, चमक-दमक, मौजमस्ती वाली आरामदायक जीवनशैली की छवि उभरती है। भारतीय फिल्म उद्योग के कई बड़े-बड़े कलाकार भी हॉलीवुड की किसी कम बजट वाली छोटी-सी फ़िल्म में छोटा-सा रोल मिल जाने पर भी खुद को धन्य महसूस करते हैं। किसी अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में रेड कार्पेट पर चलने का मौका मिल जाए, तो स्वयं को भाग्यशाली महसूस करते हैं।

यही कारण है कि भारत के बहुत-से युवा पहनावे से लेकर, बातचीत के लहजे, चालढाल, संगीत, फिल्मों, यहां तक कि हेयरस्टाइल के मामले में भी अमरीकियों की नकल करना चाहते हैं। अमरीका ने तो भारत में सेना भेजकर या भारत के लोगों को पैसों का लालच देकर ये दबाव नहीं डाला है कि वे अमरीकी चीज़ों को पसंद करें, लेकिन ये अमरीकी सॉफ्ट पॉवर से गढ़ी गई छवि का ही कमाल है कि लोग अपनी चीज़ों से ज़्यादा उनकी चीजों को पसंद करते हैं और श्रेष्ठ मानते हैं। ऐसी छवि बनने के बाद अपना मन स्वीकार नहीं कर पाता कि उस देश में कोई कमी हो सकती है या वह किसी मामले में अपने देश से पीछे भी हो सकता है।

इसका एक उदाहरण मैंने कल-परसों ही सोशल मीडिया पर देखा। मप्र के मुख्यमंत्री वॉशिंगटन के दौरे पर आए और बातों-बातों में उन्होंने हल्के-फुल्के ढंग से कह दिया कि मप्र की सड़कें वॉशिंगटन की सड़कों से भी अच्छी हैं। इस पर जो राजनैतिक बयानबाजी हुई, वह वाकई दुःखद है। मप्र कांग्रेस के अध्यक्ष ने ट्वीट करके अमरीकी राष्ट्रपति से मांग कर डाली कि अमरीका का अपमान करने के कारण शिवराजसिंह चौहान के खिलाफ केस दर्ज किया जाए! कुछ सालों पहले भी भारत के ही राजनेताओं ने भारत के ही एक पूर्व मुख्यमंत्री को वीज़ा न देने के लिए अमरीका के राष्ट्रपति से गुहार लगाई थी।

ये स्तर है अपनी मानसिकता का? अपने देश का खुद ही अपमान करने में हमें शर्म भी नहीं महसूस होती? हमारा स्वार्थ और हमारी राजनीति देश से भी बड़ी हो गई?

लेकिन मेरे लिए उससे ज़्यादा चिंताजनक ये है कि आम लोगों को भी इसमें कुछ गलत नहीं लगता। राजनीति में विरोध से मुझे दिक्कत नहीं है, लेकिन अपने झगड़े अपने घर में निपटाने चाहिए। हज़ार सालों से ये गलती करते आ रहे हैं और संभव है कि हज़ार सालों की गुलामी का ही असर है कि हमें किसी न किसी को हमसे श्रेष्ठ समझने की बीमारी लग गई है।

इसी कारण हमारे मन में ये विचार भी नहीं आता कि अमरीका की सड़कें वास्तव में खराब भी हो सकती हैं, उनमें गड्ढे भी हो सकते हैं। हमारे मन में अमरीकी सॉफ्ट पॉवर की जड़ें इतनी मज़बूती से जमी हुई है कि हमें तथ्य जांचने की ज़रूरत भी नहीं महसूस होती। लेकिन मैं तथ्य देखे बिना कभी किसी मामले में राय नहीं बनाता, इसलिए आज मैंने सोचा कि अमरीका की सड़कों के बारे में कुछ आंकड़े टटोले जाएं। जो मुझे पता चला, वो आपकी जानकारी के लिए दे रहा हूँ।

वॉशिंगटन में ही ट्रिप (TRIP) नामक एक रिसर्च ग्रुप है। इस समूह ने नवंबर 2016 में अमरीका में सड़कों की स्थिति के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की है। उस रिपोर्ट के अनुसार-

  1. अमरीका में शहरी इलाकों की सड़कों और राजमार्गों में से 32% बहुत बुरी हालत में हैं और उन पर यात्रा करना अत्यंत कष्टदायक है।
  2. इसके अलावा 39% बस कामचलाऊ स्थिति में हैं।
  3. केवल 28% सड़कें अच्छी स्थिति में हैं।
  4. सैन फ्रांसिस्को में 71% सड़कें बुरी हालत में हैं।
  5. लॉस एंजिल्स इलाके की 60% सड़कों का हाल बेहाल है।
  6. सिलिकॉन वैली की 59% सड़कों की हालत बुरी है।
  7. सड़कों की बुरी हालत के कारण सिर्फ यात्रा ही कष्टदायक नहीं हो रही है, बल्कि हर वाहन चालक को अपनी गाड़ी के रखरखाव और मरम्मत के लिए हर वर्ष औसतन 523 डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। कुछ शहरों में तो यह अतिरिक्त खर्च 1000 डॉलर से भी अधिक है। कुल मिलाकर पूरे अमरीका में यह खर्च लगभग सवा खरब डॉलर है।
  8. 2015 की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार अमरीका में सड़कों, राजमार्गों और पुलों की हालत सुधारने के लिए लगभग साढ़े सात खरब डॉलर की अतिरिक्त राशि की आवश्यकता है। लेकिन फिलहाल इसकी कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है।

ऐसी कमियां हर जगह होती हैं और खूब गिनाई जा सकती हैं। लेकिन मैं कमियां गिनाने नहीं बैठा हूँ। मैं बस कुछ उदाहरण देना चाहता था कि कुछ पढ़े-समझे बिना केवल कल्पनाओं के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाले जाने चाहिए। अमरीका में खराब सड़कें हो ही नहीं सकतीं, ये आपका भ्रम है और भारत की सड़कें अमरीका से अच्छी होना असंभव है, ये सोच आपकी मानसिक गुलामी का लक्षण है। इन दोनों से ही बचिये।

मैं बस इतना सुझाव देना चाहता हूं कि समस्याएं और कमियां सब जगह होती हैं। रोज़ सुबह उठते ही न्यूज़ चैनलों पर जो मुद्दा दिख जाए, उसी को पकड़कर दिनभर चिल्लाते रहने की बजाय समस्याओं को सुलझाने के लिए कुछ सकारात्मक प्रयास किये जाने चाहिए और वो प्रयास करना हर एक व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है।

थोड़ा उधर भी ध्यान दिया जाए, तो भारत बदलेगा, केवल भ्रामक विचारों पर बौद्धिक जुगाली करने से नहीं।ये तो मैं अक्सर दोहराता हूं कि भारतीयों को अब मानसिक गुलामी से बाहर निकल जाना चाहिए, लेकिन आज ये भी जोड़ना चाहता हूं कि दूसरे देशों की सॉफ्ट पॉवर के झांसे में मत फंसिये, बल्कि अपने देश की सॉफ्ट पॉवर को सशक्त बनाने में कुछ योगदान कीजिए। सादर!

स्त्रोत:

  1. https://twitter.com/jangid/status/923438029645135873
  2. https://en.wikipedia.org/wiki/Joseph_Nye
  3. https://youtu.be/qr7DVY_1xRA

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